सात उचक्के : इस कॉमेडी के साथ ट्रेजिडी हो गई है!

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मनीष झा, फिल्म समीक्षक

Star cast:  मनोज बाजपेयी, विजय राज, के के मेनन, अदिति शर्मा, अनुपम खेर और अनु कपूर

Director: संजीव शर्मा,

Duration: 2 घंटे 19 मिनट

सेंसर बोर्ड के द्वारा 90 कट लगाए जाने और तीन साल तक लंबे इंतजार के बाद रिलीज हुई फिल्म को देखकर आपको अंदाजा लग जाएगा कि सेंसर बोर्ड ने इतने कट क्यूं लगाए और फिल्म को डिस्ट्रीब्यूटर्स क्यों नहीं मिल रहे थे। दरअसल यह फिल्म अनुभवी औऱ प्रतिभाशाली अभिनेताओं के टैलेंट की बरबादी के सिवा कुछ नहीं है, फिल्म के सभी एक्टर्स अपने आप में फिल्म को सफल बनाने की कूव्वत रखते हैं लेकिन  अपनी पहली फिल्म निर्देशित कर रहे संजीव शर्मा बकवास स्क्रीनप्ले के साथ बहक गए हैं। कॉमेडी के नाम पर प्रचारित की जा रही यह फिल्म, कॉमेडी छोड़ कर कुछ और हो सकती है।

फिल्म एक मेंटल हॉस्पिटल से शुरु होती है, जहां बिच्छी(अनु कपूर) अपने खुद के प्रतिभा से छाप छोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन लाउड और बकवास कुछ हिलती-डुलती पिक्चराइजेशन से प्रभाव छोड़ने की बजाए फिल्म जटिल हो गई है। इतनी जटिल की दर्शक वहीं से घबरा सा जाए कि निर्देशक फिल्म को कहां ले जाना चाहते हैं

कहानी एक इंसान पप्पी की है, जिसेनिभायाहैमनोजबाजपेयीने, जो अपनी कंगाली खत्म करके अपने सपनों की रानी से शादी करना चाहता है। अपने ख्वाब पूरे करने की कोशिश में वो एक लूट प्लान करता है जिसमें उसका साथ बिच्छी देता है।

साथ ही उस प्लान में शािमल होता है एक सड़क छाप, खानाबदोश टाइप लोफर और उसकी गर्लफ्रैंड। ये उसके पड़ोसी भी हैं। पूरी फिल्म इसी पर घूमती है कि वो कैसे लूट को अंजाम देते हैं।

के के मेनन और विजय राज ने बीच बीच में कॉमेडी से थोड़ी राहत देने की कोशिश की है। लेकिन तभी इंटरवल हो जाता है, और इंटरवल के बाद तो पूछिए मत यह फिल्म बरदाश्त के बाहर हो जाती है। मनोज बाजपेयी के बीस साल के फिल्मी करियर की यह सबसे बकवास फिल्म है। हमें आश्चर्य है कि मनोज बाजपेयी ने यह फिल्म क्यूं की। निश्चित तौर पर पैसे के अलावा कोई कारण नहीं दिखता।

अनुपम खेर ७०० से ज्यादा फिल्में कर चुके हैं,जाहिर है संख्या बढ़ाने के लिए उन्होंने भी यह फिल्म की होगी। कई बार की तरह इस बार भी ओवर एक्टिंग का शिकार हो गए हैं। एक मात्र पात्र ने बाकियों की तुलना में थोड़ा प्रभावित किया है तो वो है छोटे से किरदार में अदिति शर्मा जिसने सोना का रोल अदा किया है। वो भी फिल्म के क्लाइमेक्स में फिजूल में घसीटी गई है।

फिल्मांकन सामान्य है। फिल्म की एक बात अच्छी है और वो है दिल्ली की गलियों को खूबसूरती से दिखाना, और गालियां तो पूछिए मत । पूरी फिल्म में दिल्ली की गालियों के नाम पर ठूंसी गई है। सिनेमा बनाने वालों को समझना चाहिए पर्दे पर गाली दिलवाने से हर फिल्म गैग्स ऑफ वासेपुर नहीं हो जाती। उसके लिए कहानी भी चाहिए होती है। गाने भी ऐसे नहीं है जिसका ज़िक्र किया जाए

फिल्म का बैकग्राउंट स्कोर अच्छा है लेकिन बिना पावरफुल डॉयलाग्स और सीन के बिना धार वाली तलवार है।

कुल मिलाकर फिल्म सिरदर्द है फिल्म के बाद आपको एक कप स्ट्रांग काफी की जरुरत होगी जो मैं अभी ले रहा हूं इस झटके से उबरने के िलए। यह किसी भी लिहाज से कॉमेडी नहीं है बल्कि उसकी कोशिश में बनाई गई है कॉमेडी के साथ ट्रेजिडी हो गई है। इसे देखना आपके पैसे और समय दोनों की बरबादी है।

रेटिंग : ** (2 Star)

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