टाइम्स नाऊ क्यूं दबाए बैठा था टेप ? क्या थी डील ?

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अनुरंजन झा, सीईओ, मीडिया सरकार

आज देश के बड़े बड़े मीडिया घरानों, संपादकों और पत्रकारों खास तौर रिपोर्टर्स से मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं, अगर कोई
रिपोर्टर दिन-रात मेहनत करके, अपने जी जान पर खेलकर कोई खबर लाए और कंपनी का मैनेजमेंट उस खबर को दबा जाए तो ऐसे में क्या होना चाहिए। आज यह सवाल मेरे मन में क्यूं आया आइए जरा इसपर गौर करें।

आज लगभग देश के हर कोने में एक नए न्यूज चैनल रिपब्लिक टीवी की चर्चा है। अंग्रेजी के इस टीवी चैनल को हिन्दी के दर्शक भी बड़े चाव से देख रहे हैं। मीडिया के अंदर और अर्णब गोस्वामी के चाहने वालों को पिछले ६ महीने से इस टीवी चैनल का इंतजार था। अपने लॉंच के दिन ही अर्णब ने जिस तरीके खालिस हिन्दी पट्टी की खबर के साथ आगाज किया उससे उनके इरादे साफ हो गए। एक दिन के बाद शशि थरूर निशाने पर थे वही जो हवाई जहाज के इकॉनामी क्लास में सफर करने वालों तक को कैटल क्लास का दर्जा देते हैं। मतलब साफ था दर्शकों की बंदिशें तोड़नी थी अर्णब को।

लांचिग खबर को लेकर मीडिया समुदाय में ज्यादातर लोगों ने यह कहा कि लालू यादव की खबर से शुरुआत नहीं करनी थी। लेकिन इस बार अर्णब संपादक के साथ साथ मालिक भी थे। अंग्रेजी दर्शकों में सेंध तो वो अपनी छवि से लगा सकते थे लेकिन हिन्दी के दर्शकों में सेंध लगाने के लिए ही निश्चित तौर पर अर्णब ने लालू यादव वाली खबर को चुना होगा और मेरी नजर में उसमें वो बाजी मार गए।

लेकिन बात अर्णब के चैनल लांच और उनकी खबर तक नहीं रही अब। अर्णब गोस्वामी पर उनकी पुरानी संस्था टाइम्स नाऊ ( बैनेट एंड कॉलमेन) ने इन दोनों खबरों के लिए टेप चोरी का आरोप लगाया है और मुंबई के थाने में उनके और उनके रिपोर्टर श्रीदेवी के खिलाफ फ्रॉड, चोरी और न जाने किन किन धाराओँ में मामला दर्ज कराया है। इस खबरों की सच्चाई तो जांच के बाद सामने आएगी लेकिन मेरे मन में जो सवाल उठे हैं वो आपसे शेयर कर रहा हूं । सबसे पहले मैं यह मान कर चल रहा हूं कि वो दोनों टेप टाइम्स नाऊ की संपत्ति है। निश्चित तौर पर यह टेप जब अर्णब गोस्वामी अपने पूर्व के संस्थान में संपादक रहे होंगे तभी के होंगे और संस्थान छोड़ते वक्त अपने साथ ले आए होंगे। जैसा कि आरोपों से लगता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अर्णब के टाइम्स नाऊ छोड़ने के छ महीने बाद तक आखिर किन वजहों से यह टेप टाइम्स नाऊ ने नहीं चलाया। अगर यह टेप टाइम्स नाऊ के पास था तो कब से था, क्या अर्णब ने टाइम्स नाऊ पर इसे चलाने की कोशिश की और उन्हें रोका गया। दूसरी बात अगर वो टेप अपने संबंधों के सहारे किसी रिपोर्टर ने हासिल किए हैं तो उसपर किसी भी संस्थान से ज्यादा अधिकार उस रिपोर्टर का क्यूं नहीं बनता। जिन अधिकारियों ने रिपोर्टर को वो टेप मुहैया कराया होगा निश्चित तौर पर वो निहायत निजी संबंधों से संभव हुआ होगा। हर अधिकारी यह भी जानता है कि कोई भी रिपोर्टर लंबे समय तक संस्थान से बंध कर नहीं रहता लेकिन खबर की तह तक जाने में संस्थान के साथ साथ रिपोर्टर का रोल ज्यादा अहम होता है और खासतौर पर इंवेस्टिगेशन में तो संस्थान मायने नहीं रखता।

जब कोई अधिकारी रिस्क लेकर रिपोर्टर को टेप मुहैया कराता है तो उसकी कोशिश होती है कि खुलासा हो ताकि मामला सामने आए। नीरा राडिया टेप मामले में भी ऐसा हो चुका है। मैं इसका खुद गवाह हूं, नीरा राडिया की खबर मीडिया सरकार पर पब्लिश होने के लगभग छ महीने बाद मीडिया की सुर्खियां बनी। टेप सबसे पहले हमने सीएनईबी न्यूज चैनल पर चलाया और लगभग १० दिन लगातार अलग अलग हिस्सा चलाने के बाद जी न्यूज ने उसे उठाया। ऐसे टेप वाली खबरों में संस्थान का रोल सीमित या न के बराबर होता है। यह रिपोर्टर औऱ टेप मुहैया कराने वाले अधिकारी के निजी संबंधों पर टिका होता है। ऐसे में अगर उक्त रिपोर्टर ने वो टेप बतौर रिपोर्टर हासिल किया तो उसकी निजी संपत्ति होनी चाहिए बशर्ते उस टेप के लिए संस्थान ने किसी अधिकारी को मोटी रकम नहीं दी हो।

अब तो होना यह चाहिए कि अगर टाइम्स समूह ने इन टेप्स को हासिल करने के लिए मोटी रकम खर्च की है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि अाखिर कौन सा अधिकारी मोटी रकम लेकर अंदर की खबर बाहर दे रहा है और अगर यह रिपोर्टर के महज निजी संबधो ंकी देन है तो संस्थान पर हक से ज्यादा सवाल हैं कि आखिर उसके पास खबर होने के बाद संस्थान ने अब तक क्यूं दबा रखा था, आखिर क्या डील है। मामले से यह भी साफ होता है कि टाइम्स नाऊ में रहते हुए अर्णब संस्थान के दबाव में सुनंदा पुष्कर टेप नहीं चला पाए क्योंकि रिपोर्टर और टाइम्स समूह के कंप्लेन में साफ है कि उक्त टेप रिपोर्टर के पास लंबे समय से था ऐसे में पूर्व में टाइम्स नाऊ ने यह क्यूं नहीं चलाया। निश्चित तौर टीवी स्क्रीन पर बिंदास संपादक दिखने के बावजूद अर्णब पर दबाव थे और उसी घुटन से उबरने का जरिया है उनका रिपब्लिक

दरअसल टाइम्स समूह का यह कदम खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहानी है । संस्थान से अलग होने के बाद सार्वजनिक मंचों पर भी अर्णब ने संस्थान के रवैये का जिक्र किया है, निश्चित तौर पर संस्थान से व्यक्ति बड़ा नहीं होता लेकिन दोनों एक दूसरे के पूरक जरुर होते हैं। अर्णब के जाने के बाद टाइम्स नाऊ की कोई खबर याद नहीं आ रही जिसने असर छोड़ी हो। ऐसे में पहले चैनल पर चलने वाले टैगलाइन और बाद में यह टेप चोरी के आरोप अर्णब की छवि धुमिल करने के लिए ही है लेकिन हमें लगता है कि टाइम्स समूह से ज्यादा लाभ ऐसे मामलों का अर्णब को ही मिलेगा और हमें तो इसलिए भी साथ देना चाहिए क्यूंकि एक पत्रकार चैनल का मालिक बना है उसे मजबूत करने से ही मीडिया मजबूत होगा न कि उनसे जो अखबार के साथ टैगलाइन लगाते हैं – Its Bennett & Coleman Product.