जरा याद करो वो ‘वाणी ‘ : आश्वासनों की थाली में शब्दों के व्यंजन कब तक ?

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सन 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत! प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने संसद में अपने पहले संबोधन में भी एक ऐतिहासिक घोषणा की थी. संसद के द्वार पर माथा टेक इसकी पवित्रता चिह्नित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने प्रण लिया था संसद और सांसदों को भी ‘दाग मुक्त’ करने का.

उत्साहित, दृढ़प्रतिज्ञ प्रधानमंत्री ने तब संसद में घोषणा की थी कि एक साल के अंदर संसद और सांसद दागमुक्त होंगे. पूरे देश ने तब प्रधानमंत्री मोदी के इस वक्तव्य का हृदय से स्वागत किया था. दशकों से अनेक दागयुक्त सांसद पवित्र संसद को दागदार बनाते रहे थे. संसद की मयार्दा-गरिमा पर चोट करते रहे थे. पूरे देश की राजनीति, समाज, सत्ता और सार्वजानिक जीवन में आमूलचूल परिवर्तन का शपथ लेनेवाले प्रधानमंत्री मोदी से लोगों को आशा बंधी कि अब एक स्वच्छ लोकतंत्र, स्वच्छ संसद, स्वच्छ सत्ता और एक स्वच्छ अभिनव समाज का उदय होगा. लेकिन इसकी पहली शर्त थी- सांसदों का दाग मुक्त होना. प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए दागमुक्त संसद और दागमुक्त सांसद की अपनी इच्छा, अपने संकल्प को प्रकट किया था.

लेकिन एक वर्ष नहीं, अब लगभग ढाई वर्ष व्यतीत हो चुके हैं. संसद और सांसद दागमुक्त नहीं हुए. वहीं दागदार सांसदों की फौज!… और क्षमा करेंगे, इन सांसदों के कारण वही दागदार संसद, प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा गलत साबित हुई.

क्या इसके लिए प्रधानमंत्री ने कोई विशेष पहल की थी? क्या पहल के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले?… नहीं!… किसी विशेष पहल की कोई झलक कभी नहीं मिली. बल्कि इसके विपरीत देश ने देखा कि कुछ दागदार सांसदों को मंत्रीपरिषद में शामिल किया गया. साफ है कि दागमुक्त संसद की बात मात्र अतिउत्साही कल्पना भर बनकर रह गई. प्रधानमंत्री अपने वादे पूरे नहीं कर पाने के दोषी बन गए.

ढाई साल पुरानी इस बात का उल्लेख इसलिए कि देश अब नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में नई सरकार के आधे कार्यकाल पूरा करने के बाद देशवासी समीक्षा पर उतर आए हैं. अब देशवासियों को याद आ रहे हैं चुनाव पूर्व और चुनाव पश्चात नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए अन्य वादों की तरह वैसे वादों की, जो पूरे नहीं किए जा सके. ऐसे वादों की, जिसकी पूर्ति नहीं होने की दशा में अपना जीवन त्याग कर देने की बात उन्होंने की थी.

चुनाव पूर्व पहला वादा ! नरेन्द्र मोदी ने किया था कि ‘आप मुझे 100 दिनों की सरकार दो, मैं विदेश में जमा सारा लाखों-करोड़ों का काला धन वापस ले आऊंगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो मुझे फांसी पर चढ़ा देना.’

न तो विदेशों से कोई काला धन वापस आया है और न ही प्रधानमंत्री को फांसी पर लटकाने की पहल की गई. वादा झूठा साबित हुआ.

दूसरा महत्वपूर्ण वादा ! प्रधानमंत्री बनने के बाद अनेक वादों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण वादा ! 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा से पूरे देश में मची अफरा-तफरी के बाद उन्होंने फिर देश से कहा था कि ‘आप मुझे 50 दिनों का समय दो, अगर इस बीच स्थिति सामान्य नहीं हुई तो आप मुझे चौराहे पर जला देना.’ 50 दिनों के अवधि अगले 96 घंटों में समाप्त होने जा रही है. स्थिति सामान्य होने के कोई संकेत नहीं हैं.

तो क्या पुन: वादे की विफलता की स्थित में लोग-बाग उन्हें चौराहे पर जला देंगे? या फिर प्रधानमंत्री स्वयं को इसके लिए प्रस्तुत करेंगे? …सवाल ही पैदा नहीं होता.

जनता राजनेताओं के आश्वासनों, वादों और विफलताओं की आदी हो चुकी है. देश की जनता के लिए झूठे आश्वासन, झूठे वादे कोई नई बात नहीं. लेकिन इन मामलों में, चूँकि स्वयं प्रधानमंत्री कसौटी पर हैं, देशवासियों को सदमा पहुंचना स्वाभाविक है. प्रधानमंत्री बार-बार वादे करते रहे, झूठा साबित होते रहे. ऐसे स्थिति से दो-चार होकर देश की जनता रुदन को विवश है.

सचमुच , यह भारत देश और भारतवासियों की नियति है कि उन्हें बार-बार आश्वासनों की थाली में शब्दों के व्यंजन परोस दिए जाते हैं. क्या ऐसी अवस्था पर कभी पूर्ण विराम लगेगा?

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