सर्जिकल स्ट्राइक: कौन हारा, कौन जीता

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‘सर्जिकल स्ट्राइक’ एक ट्रेलर मात्र है। यानी जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी रहेगा। पूरे देश ने जब इसकी सराहना की हो, जब जरूरत राष्ट्रीय एकता की हो, तब विपक्ष की सेना का मनोबल तोडऩे वाली ऐसी कवायद क्यों? विलंब अभी भी नहीं हुआ है। सबूत मांगने वाले दल-नेता क्षमा मांगें।

 

दु:खद ही नहीं, निंदनीय है यह!

देश के इतिहास में पहला अवसर सिर्फयह ही नहीं कि सेना की किसी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को आधिकारिक रूप में सार्वजनिक किया गया, बल्कि पहला अवसर यह भी कि देश के कुछ नेता व दल सार्वजनिक रूप से सेना के मनोबल को गिरा रहे हैं। पहला अवसर यह भी कि सेना की किसी कार्रवाई को लेकर निम्र स्तर की सियासत शुरू हो गई है। देश का प्रबुद्ध वर्ग हतप्रभ है। पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकी प्रशिक्षण कैम्पों पर भारतीय सेना के जवानों ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर छिन्न-भिन्न कर डाला। बहादुरी भरे इस कारनामे पर सियासत! अपनी कुटिल रणनीति के तहत पाकिस्तान ने ऐसे किसी हमले से इनकार क्या किया कि भारत के कुछ राजदल व राजनेताओं ने भारत सरकार से ही हमले की सच्चाई पर सबूत मांग डाले। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकी, बल्कि अनेक मामलों में आतंकी के वेश में पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा के अंदर घुसपैठ कर मौत का तांडव मंचित करते रहे हैं। दुस्साहस इतना कि भारतीय संसद और भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई के भीड़भाड़ वाले इलाके में आत्मघाती दस्ते खून की होली खेलने से भी नहीं चूके। पिछले दिनों जब पठानकोट वायु सैनिक स्टेशन और उरी सैन्य मुख्यालय पर आतंकी हमले के बाद से ही पूरा देश पाकिस्तान को सबक सिखाने की मांग पर एकजुट रहा। राष्ट्रीय आक्रोश को देखते हुए ही प्रधानमंत्री मोदी ने शहीदों को खून को व्यर्थ नहीं जाने देने की बात कही थी। पाक अधिकृत कश्मीर के आतंकी केद्रों पर सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ वस्तुत: भारत की ओर से जवाबी कार्रवाई का एक अंग था। कहा तो यह भी गया कि ताजा ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ एक ट्रेलर मात्र है। अर्थात जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी रहेगा। पूरे देश ने इसकी सराहना की। इस बीच, भारतीय सेना के जांबाज जवानों की कार्रवाई पर अगर संदेह भरे सवाल खड़े किए जाते हैं, तो दु:ख्द है। जब जरूरत राष्ट्रीय एकता की है, तब फिर सेना का मनोबल तोडऩे वाली ऐसी कवायद क्यों? शर्मनाक तो यह कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पर न केवल ये तत्व शंका व्यक्त कर रहे हैं, बल्कि सबूत भी मांग रहे हैं। लोकतांत्रिक दलीय प्रणाली के अंतर्गत विरोध एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। किंतु, जब बात दुश्मन देश की ओर से आक्रमण की हो, खूनी आतंकी घुसपैठ की हो, सीमा और देश की अखंडता की, सुरक्षा की हो, तब ऐसे सवाल खड़े करने वाले कटघरे में खड़े किए जाएंगे ही। वही हो रहा है। विलंब अभी भी नहीं हुआ है। सबूत मांगने वाले दल-नेता क्षमा मांगें-देश से, भारतीय सेना से और दुश्मन की कार्रवाई के कारण शहीद हुए भारतीय जवानों के परिवारों से…! क्योंकि उनकी हरकत से देश और सेना का मनोबल हार रहा है…शहीदों की आत्माएं रुदन कर रही होंगी!