“मिर्ज़्या” : मेहरा की दुखांत प्रेमकथा “जाया” हो गई: **1/2

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मनीष झा, फिल्म समीक्षक

 

“मिर्ज्या” : मेहरा की दुखांत प्रेमकथा “जाया” हो गई

पंजाब की लोककथाओं में प्रचलित और चर्चित चार प्रेमकहानियों में से एक कहानी है मिर्जा-सािहबां की । इन सारी प्रेमकथाओं का अंत दुखद है, चाहे वो हीर-रांझा हों, सोनी-महिवाल हो या फिर ससी-पुनून। निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने इस बार हिन्दी सिनेमा के दर्शकों के लिए चौथी कहानी मिर्जा-साहिबां को चुना या यूं कहिए अपने चाहनेवालों के लिए। फिल्म बिल्कुल मेहरा ट्रेडमार्क स्टाइल में शुरु होती है – म्यूजिकल स्टाइल – दलेर मेंहदी की आवाज एक बार तो मेहरा की रंग दे बसंती को आपके जेहन में जिंदा करती है। रंग दे बसंती महज मेहरा ही नहीं बॉलीवुड की कल्ट फिल्मों में से एक है लेकिन जैसे ही ओमपुरी का लंबा और उबाऊ वायस ओवर – लहरों की गली और शेरो-शायरी की शक्ल में शुरु होता है फिल्म की रफ्तार वहीं दम तोड़ने लगती है।

मेहरा की यह ताजा रचना “मिर्ज़्या” राजस्थान पृष्ठभूमि की रोमांटिक थ्रिलर है। पहले सीन से लेकर आखिरी दृश्य तक निश्चित तौर पर यह बेहतरीन फिल्मांकन का नमूना है लेकिन क्या होता है कि कई बार बेहतर क्रिएटिव शख्स भी अपनी बात दर्शकों तक सही तरीके से पहुंचा नहीं पाता है। मिर्ज्या के साथ भी वही हुआ है, निर्देशक और दर्शक के बीच संबंध बनाने में मिर्ज्या नाकाम रही है, प्रेम कहानी की ट्रेजिडी के इतर यही फिल्म की ट्रेिजडी है। जब जब दर्शक फिल्म के साथ जुड़ता है वहीं फिल्म दलेर मेंहदी के दिल की आवाज सुनाने लगाता है, दर्शक अपने दिल दिमाग और याद्दाश्त के बीच सामंजस्य नहीं बिठा पाता, फिल्म सुस्त हो जाती है और नैरेशन हावी हो जाता है।

फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक शानदार है, दृश्यों के साथ तालमेल के लिए उसपर गहन मेहनत की गई है, बिल्कुल किसी गूढ़ विषय को सुलझाने की तरह , और यही वजह है कि संगीत कई दफा पात्र पर भारी पड़ता है। बावजूद इसके फिल्म आपको बांध कर नहीं रखती। मुख्य पात्र के बचपन के किरदार फिल्म में तकरीबन बीस मिनट तक दिखाए गए हैं जो निश्चित तौर पर थोड़े लंबे हैं.

कहानी सीधी-साधारण प्रेम कहानी है जिसमें हल्के और दिलचस्प मोड़ आते हैं जैसा कि आप-हम किसी भी क्लासिक प्रेम कहानी में उम्मीद करते हैं, किसी भी अभिनेता को अपनी पहली फिल्म के लिए यही चाहिए होता है, सीधी सच्ची कहानी और जबरदस्त निर्देशक । यह दोनों चीजें अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर को मिली है, लेकिन सुस्त फिल्म होने की वजह से इसके भी “सावरिया” हो जाने का डर है। कुछेक दृश्यों में हर्षवर्धन ने अपनी प्रतिभा दिखाने का प्रयास किया है लेकिन प्रभाव छोड़ने में खासकर इमोशनल दृश्यों में मात खा गए हैं। नवोदित अभिनेत्री सयामी खेर (सुचि) बला की खूबसूरत लगी है और ठीक-ठाक अभिनय किया है जो कि किसी भी अभिनेत्री के लिए पहली फिल्म के लिहाज से अच्छा माना जा सकता है। यहां एक बात और बताते चलें कि अगर सयामी अभिनय की दुनिया में कदम नहीं रखती तो भारतीय महिला क्रिकेट टीम का सदस्य होतीं, भारतीय क्रिकेट टीम में चुने जाने के बाद उन्होंने अभिनय की ओर रुख किया। उनकी फिटनेस इस तरफ इशारा भी करती है। सयामी अपनी खूबसूरती से बॉक्स ऑफिस पर कितना भीड़ जुटा पाएंगी यह तो पता चल ही जाएगा लेकिन अगर क्रिकेट के मैदान में होती तो स्टेडियम खचाखच जरुर भर जाता।

अपने छोटे से किरदार में अंजलि पाटिल ने शानदार काम किया है, चक्रव्यूह के बाद अँजलि ने एक बार फिर अपनी छाप छोड़ी है। वहीं ओम पुरी, के के रैना और अनुज चौधरी सामान्य रहे हैं। शंकर-अहसान-लॉय इस बार चूक गए हैं, फिल्म का संगीत पक्ष बैकग्राउंड स्कोर के उलट बिल्कुल प्रभाव नहीं छोड़ता। छोटे-बड़े पंद्रह गाने जबरदस्ती ठूंसे हुए लगते हैँ। छोटे- छोटे टुकड़ों में गानों का बार बार आना फिल्म को कमजोर करता है जिसे शायद निर्देशक ने सबसे बड़ी ताकत माना है। दलेर मेंहदी की आवाज बार-बार आकर एक बार तो आपको परेशान ही कर देती है।

सिनेमेटोग्राफी जबरदस्त है, और आपको मंत्रमुग्ध कर देता है। फिल्मांकन ही फिल्म का सबसे मजबूत पहलू है और इस साल के बहु-प्रतीक्षित फिल्मों में से एक इस फिल्म के लिए राहत की बात है। यह फिल्म उन चुनिंदा फिल्मों में गिनी जाएगी जिसने राजस्थान की खूबसूरती को उभारा होगा। जोधपुर के दृश्य तो लाजवाब बन पड़े हैं। निश्चित तौर पर अगले साल अवार्ड समारोहों में फिल्मांकन के लिए कई अवार्ड अपनी झोली में डालती दिख सकती है। पॉवेल डेलस ने वाकई शानदार और जानदार काम किया है लेकिन वो भी शायद ही इस फिल्म को बचा पाएँ।

फिल्म मिर्जा-साहिबान के साथ न्याय नहीं करती, लोगों के दिल को नहीं छू पाती और उनके साथ रिश्ता भी नहीं बना पाती जैसा कि प्रेम कहानियां करती है और मेहरा ने भी अच्छे रिश्ते की बात तो सोची ही होगी। यह बीच में ही कहीं पटरी से उतर जाती है जो फिर काफी कोशिश के बावजूद पटरी पर नहीं लौटती। वास्तविकता और कल्पना का कॉकटेल मिर्ज़्या के साथ न्याय नहीं कर पाता जबकि रंग दे बसंती में हो पाया था। राकेश ओमप्रकाश मेहरा का यह ताजा संस्करण निराश करता है। उलझन के साथ फिल्म लंबी और उबाऊ हो जाती है फिर खत्म होती है

इस बार आदर्श प्रेम कहानी को अपने रंग में कहने की कोशिश में मेहरा चूक गए हैं और दर्शकों की नब्ज पर उनकी पकड़ नहीं बैठती। इसका असर बॉक्स ऑफिस पर दिखेगा और कह सकते हैं कि हर्षवर्धन औऱ सयामी के लिए आदर्श आरंभ तो नहीं ही है

अगर आप मनोजरंजन के आदी हैं तो मिर्ज़्या में अपने पैसे और वक्त जाया मत कीजिए। जो राकेश ओमप्रकाश मेहरा के जबरा फैन हैं वो अच्छी सिनेमेटोग्राफी के िलए देखने जाइए, घर लौट कर आइए और अगर डिप्रेशन अनुभव करें तो रंग दे बसंती एक बार फिर से देखकर उससे निजात पाइए

इस फिल्म को ओवरऑल २ स्टार और बेहतरीन फिल्मांकन के िलए अलग से से आधा स्टार – यानी कुल मिलाकर **1/2 ढ़ाई स्टार .

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Mirzya, Mehra’s Tragic Take ON Love Goes  ” Zaya” ( Waste)  !

The legend of Mirza-Sahiban is one of the four tragic romances that are most popular in the folklore of Punjab. The other three tragic romances are the stories of Heer-Ranjha, Soni-Mahiwal and Sassi-Punnun. Director Rakesh Omprakash Mehra picks Mirza-Sahibaan to have it crafted and told to hindi Cinema viewers. The film opens with Mehra ‘s trademark ‘musical style’ – Daler Mehndi’s Voice which pushes you back to his magical flick “ Rang De Basanti ” which is still one of the cult movies of Hindi Cinema Opening with Ompuri’s – Loharon Ki Gali and sher-o-shayri VO is draggy and boring which slows the start.

His Latest Take “ Mirzya” is a romantic thriller set at Rajasthan. From the first shot of the movie till its last frame it’s a cinematic treat for viewers there is no doubt about that, but sometimes creative people go to a frequency which is hard for viewers to understand as what they want to express and communicate, With Mirzya its tragedy of communication and connect. Every time viewer gets connected to the movie the movie switches to blue mode (Fantasy mode) with Dlaer’s voice, which slows the movie down and dominates the narration.

The background music is been done with intricate detailing of scenes, which is sometime, more expressive than the characters of the movie. The movie never holds you tight, as it should; the early 20 minutes of childhood for Suchi and Munish the lead characters are a bit too long. You can feel the enigmatic sound of Violin all over the movie.

The story is simple with normal twists and turns one would expect from a classic love story, what better director one would want for a debut movie which Harshwardhan kapoor got but unfortunately it would be another “Sawariya” , although Harshvardhan shows potential in few scenes but he fails with his expression and emotions which is quite normal for any new comer. Saiyami kher ( Suchi) Looks beautiful and has done okay for his first Hindi flick. In a small role of Jeenat Anjali Patil has done commendable job, short yet impactful. Om Puri , K.K Raina and Anuj Chaudhri as Karan are just about OK. The Music of movie seems forced and Shankar-Ahsan-Loy are not at all impressive this time, music comes in bits and pieces and slows down the pace of the movie and at times its very loud, Its too Much of Daler’s Voice all over which after a point puts you off.

Cinematography Is truly mesmerizing, its treat for viewers and one of the saving grace for one the most awaited movies of the year. This is certainly one of those films, which has shown beautiful and vibrant Rajasthan; especially shots of Jodhpur are amazing. It could very well be one of the contenders for best Cinematography for next year awards. Paweł Dyllus had done a Good Job but not enough for the film to be saved.

The movie doesn’t do justice to Mirza-Sahibaan neither does it touches and connects to the audience the way Mehra would have thought it would be. It somehow gets derailed in between and never comes back on track. The mix of reality and fantasy never gels well at least for Mirzya,although it had worked wonderfully with Rang De Basanti. This version of Rakesh Omprakash Mehra fails to impress the viewers, as it gets complicated and distracting and to add more to it the lengthy and draggy climax.

This time the classic love story is all done in typical contemporary Mehra style fails to hold the viewer and will defiantly fail to keep it ringing at box office. It is a Miss HIT for Mehra and not a great debut for Harshvardhan Kapoor or Saiyami Kher.

If you are up for entertainment – Don’t “ Zaya” Money and Time for “Mirzya” and for the ardent Fans of Rakesh Omprakash Mehra, go and get the visual treat you can come back and watch Rang De Basanti once again if you feel depressed.

Verdict –
2 Star for Movie and (Special ½ for Cinematography and Background Score)

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