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Written by डॉ. ज्ञानचंद्र शर्मा on Monday, 21 January 2013 18:30
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उपन्यास साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसमें निजी विचारों-भावनाओं के समावेश की संभावनाएं अपेक्षाकृत अधिक रहती हैं। हिन्दी उपन्यास का उद्भव स्वाधीनता आंदोलन की पृष्ठïभूमि में हुआ और इसका विकास उसके चरमोत्कर्ष के साथ हुआ।
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Written by डॉ. प्रद्युम्न भल्ला on Tuesday, 15 January 2013 04:24
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डॉ. मंजु दलाल के सद्य: प्रकाशित तीसरे उपन्यास पनाह की केंद्रबिन्दु व मुख्य पात्र मैथिली के माध्यम से मंजु दलाल ने स्त्री समाज की उस समस्या का खूबसूरती से निरूपण किया है जिससे आज कमोबेश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष स्त्रियां जूझ रही हैं।
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Written by स्मिता on Monday, 14 January 2013 04:52
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जिंदगी की जंग में जीत तभी मिल सकती है, जब दिलेरी से अपनी बात घर और बाहर
दोनों जगह रखी जाए। अगर ऐसी ही सोच वाले लोग मिलकर काम करें, तो परिणाम मील
का पत्थर भी हो सकता है। यही कहने का प्रयास किया है रवींद्र शुक्ला ने
अपने इस उपन्यास में..
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Written by रामकिशोर पारचा on Friday, 11 January 2013 17:02
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रेटिंग - ५/3
दो टूक : सपनों के पूरे होने की चाहत किसे नहीं होती पर कोई सपना अगर आँख की पलकों को नोचने लगे तो उसका आंख से दूर हो जाना ही बेहतर। ये अलग बात है कि कुछ लोग सपनों को आंख से दूर होने के बाद भी उसे पूरा कर दिखाते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी कहती है निर्देशक विशाल भारद्वाज की इमरान खान, अनुष्का शर्मा, पंकज कपूर, शबाना आजमी, आर्य बब्बर, नवनीत निशान और रणवीर शौरी के अभिनय वाली फिल्म मटरू की बिजली का मंडोला।
कहानी : मटरू की बिजली का मंडोला की कहानी हरियाणा के मंडोला नाम के गाँव में रहने वाले हरिया उर्फ़ हैरी मंडोला (पंकज कपूर) से जुडी है। मंडोला पैसे वाला उद्योगपति लेकिन पियक्कड़ है। वह अपनी बेटी बिजली (अनुष्का शर्मा) को चालाक ताकतवर नेता चौधरी देवी [शबाना आजमी ] के बेटे बादल [आर्य बब्बर ] से बियाहाने के सपने देख रहा है ताकि खुद अपने यहाँ के किसानों की जमीं पर अपने नाम की इमारते और फैक्ट्री बनाने के सपने को पूरा कर सके. मंडोला की बेटी का उसके अपने खास आदमी मटरू (इमरान खान) से खट्टा-मीठा रिश्ता है। लेकिन जब ये प्यार परवान चढ़ता है तो सबकुछ उल्टा पुल्टा हो जाता है। ना केवल चौधरी देवी की हकीकत सामने आती है बल्कि मंडोला को भी अहसास होता है कि सपनों और हकीकत में फर्क होता है। बस कुछ ऐसे ही खट्टे मिठ्ठे रिश्तों की कहानी है मटरू की बिजली का मंडोला।
गीत संगीत : फिल्म में गुलजार के लिखे गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत है। विशाल की फ़िल्में विषयक होती हैं और इस बार भी उनकी फिल्म में गुलजार ने ऐसे गीत लिखे हैं जो उनकी फिल्म के विषय, परिवेश और आंचलिकता को जोड़कर रचे गए हैं। फिल्म में लोक संगीत और हरियाण के राग रागिनी की गमक सुनाई देती है और शायद इसलिए ओये बॉय चार्ली के साथ रणजीत बारोट और सुखविंदर का गाया शीर्षक गीत भी लोगों को भा गया है। मटरू की बिजली का मनडोला, प्रेम देहाती का खामखा,शरा रारा रा जैसे गीत सुने जा सकते हैं .
अभिनय : विशाल की ये पहली फिल्म है जिसमे बहुत सारे चरित्र तो हैं पर कुल जमा दो चार चरित्रों के सहारे ही कहानी को बुन दिया गया है . फिल्म का नामा भी उनके नायक मटरू से शुरू होता है पर मंडोला यानी पंकज कपूर ही केंद्र में हैं। पंकज का चरित्र दोहरे स्तर पर बुना गया है और उहोने उसे जीवन्तता के साथ अभिनीत भी किया है। उनकी संवाद अदायगी और शारीरिक भाषा के साथ उनकी अपने चरित्र को व्याख्यित करने का तरीका भी सबसे अलग है। इमरान के बस का अभी भी कुछ नहीं है . अगर उनके लुक को निकाल दिया जाए तो वो और अनुष्का बस दोहराव का शिकार भर रहे हैं . शबाना ने अपने पहले के चरित्रों से अलग नाकाराक्त्मता का नया अंदाज प्रस्तुत किया है लेकिन आर्य बब्बर को बहुत मौका नहीं मिला है। रणवीर शौरी के हिस्से में बस एक दृश्य आया है और नवनीत निशान अतिरेकता का शिकार हो गयी। इसके अलावा फिल्म में बहुत से छोटे छोटे से पात्र और चरित्र हैं पर उन्हें याद रखना मुश्किल काम है।
निर्देशन : आमतौर पर विशाल की फ़िल्में किसी न किसी साहित्यिक कृति से प्रेरित या उस पर आधारित होती हैं लेकिन मटरू की बिजली का मनडोला के साथ ऐसा ना होते हुए भी उनकी ये फिल्म एक किताब की तरह खुलती और बंद होती है। फिल्म में वो माओ और शेक्सपियर का मेकबेथ पढ़ते हुए पात्र दिखाते हैं तो दूसरी और प्रगति और विकास के बीच आम आदमी के संघर्ष को भी। लेकिन अगर इसका बाद भी ये फिल्म उनकी फिल्म की शैली की नहीं लगती तो इसका कारण है कि फिल्म की गति को वे बहुत देर से छूते हैं। विशाल ने दरअसल इस फिल्म को एक नुक्कड़ नाटक की तरह बरता है। शायद इसलिए उनकी फिल्म के पात्रों का विकास बहुत देर से होता है और वे खुद को कहानी में अपना परिचय देने के बाद भी स्थिर नहीं रख पाते। मध्यांतर के बाद ही फिल्म कुछ गति लेने के बाद हमसे जुड़ पाती है। फिल्म में चुटीले संवाद हैं और अपने अन्दर के जाले भी साफ़ कर ले, हौन्तेड हाउस लगने लगी है जैसे संवाद याद रहते है . फिल्म में खेतों में घुमाया कैमरा उसे पीले और कथई का शानदार कैनवास बनाता है। सो आप तो एक बार फिल्म जरुर देख लें .
फिल्म क्यों देखें : विशाल की एक और देखने वाली फिल्म है
फिल्म क्यों न देखें : मेरे पास तो ऐसा कोई कारण नहीं हैं
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Written by मीडिया सरकार on Tuesday, 08 January 2013 14:38
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लंदन में रह रहीं लेखिका शिखा वाष्र्णेय ने 90 के दशक में अपने रूस प्रवास की स्मृतियों को संजोया है अपनी पुस्तक स्मृतियों में रूस में। एक भारतीय संस्कृति में पली-बढी लडकी का पराये देश अध्ययन के लिए जाते समय उत्पन्न हुई पारिवारिक मनोदशा एवं परिजनों की चिंता का बडा ही व्यावहारिक पक्ष पुस्तक के प्रथम अध्याय दोपहर और नई सुबह में देखने को मिलता है।
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