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Written by रामकिशोर पारचा on Friday, 11 January 2013 17:02
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रेटिंग - ५/3
दो टूक : सपनों के पूरे होने की चाहत किसे नहीं होती पर कोई सपना अगर आँख की पलकों को नोचने लगे तो उसका आंख से दूर हो जाना ही बेहतर। ये अलग बात है कि कुछ लोग सपनों को आंख से दूर होने के बाद भी उसे पूरा कर दिखाते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी कहती है निर्देशक विशाल भारद्वाज की इमरान खान, अनुष्का शर्मा, पंकज कपूर, शबाना आजमी, आर्य बब्बर, नवनीत निशान और रणवीर शौरी के अभिनय वाली फिल्म मटरू की बिजली का मंडोला।
कहानी : मटरू की बिजली का मंडोला की कहानी हरियाणा के मंडोला नाम के गाँव में रहने वाले हरिया उर्फ़ हैरी मंडोला (पंकज कपूर) से जुडी है। मंडोला पैसे वाला उद्योगपति लेकिन पियक्कड़ है। वह अपनी बेटी बिजली (अनुष्का शर्मा) को चालाक ताकतवर नेता चौधरी देवी [शबाना आजमी ] के बेटे बादल [आर्य बब्बर ] से बियाहाने के सपने देख रहा है ताकि खुद अपने यहाँ के किसानों की जमीं पर अपने नाम की इमारते और फैक्ट्री बनाने के सपने को पूरा कर सके. मंडोला की बेटी का उसके अपने खास आदमी मटरू (इमरान खान) से खट्टा-मीठा रिश्ता है। लेकिन जब ये प्यार परवान चढ़ता है तो सबकुछ उल्टा पुल्टा हो जाता है। ना केवल चौधरी देवी की हकीकत सामने आती है बल्कि मंडोला को भी अहसास होता है कि सपनों और हकीकत में फर्क होता है। बस कुछ ऐसे ही खट्टे मिठ्ठे रिश्तों की कहानी है मटरू की बिजली का मंडोला।
गीत संगीत : फिल्म में गुलजार के लिखे गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत है। विशाल की फ़िल्में विषयक होती हैं और इस बार भी उनकी फिल्म में गुलजार ने ऐसे गीत लिखे हैं जो उनकी फिल्म के विषय, परिवेश और आंचलिकता को जोड़कर रचे गए हैं। फिल्म में लोक संगीत और हरियाण के राग रागिनी की गमक सुनाई देती है और शायद इसलिए ओये बॉय चार्ली के साथ रणजीत बारोट और सुखविंदर का गाया शीर्षक गीत भी लोगों को भा गया है। मटरू की बिजली का मनडोला, प्रेम देहाती का खामखा,शरा रारा रा जैसे गीत सुने जा सकते हैं .
अभिनय : विशाल की ये पहली फिल्म है जिसमे बहुत सारे चरित्र तो हैं पर कुल जमा दो चार चरित्रों के सहारे ही कहानी को बुन दिया गया है . फिल्म का नामा भी उनके नायक मटरू से शुरू होता है पर मंडोला यानी पंकज कपूर ही केंद्र में हैं। पंकज का चरित्र दोहरे स्तर पर बुना गया है और उहोने उसे जीवन्तता के साथ अभिनीत भी किया है। उनकी संवाद अदायगी और शारीरिक भाषा के साथ उनकी अपने चरित्र को व्याख्यित करने का तरीका भी सबसे अलग है। इमरान के बस का अभी भी कुछ नहीं है . अगर उनके लुक को निकाल दिया जाए तो वो और अनुष्का बस दोहराव का शिकार भर रहे हैं . शबाना ने अपने पहले के चरित्रों से अलग नाकाराक्त्मता का नया अंदाज प्रस्तुत किया है लेकिन आर्य बब्बर को बहुत मौका नहीं मिला है। रणवीर शौरी के हिस्से में बस एक दृश्य आया है और नवनीत निशान अतिरेकता का शिकार हो गयी। इसके अलावा फिल्म में बहुत से छोटे छोटे से पात्र और चरित्र हैं पर उन्हें याद रखना मुश्किल काम है।
निर्देशन : आमतौर पर विशाल की फ़िल्में किसी न किसी साहित्यिक कृति से प्रेरित या उस पर आधारित होती हैं लेकिन मटरू की बिजली का मनडोला के साथ ऐसा ना होते हुए भी उनकी ये फिल्म एक किताब की तरह खुलती और बंद होती है। फिल्म में वो माओ और शेक्सपियर का मेकबेथ पढ़ते हुए पात्र दिखाते हैं तो दूसरी और प्रगति और विकास के बीच आम आदमी के संघर्ष को भी। लेकिन अगर इसका बाद भी ये फिल्म उनकी फिल्म की शैली की नहीं लगती तो इसका कारण है कि फिल्म की गति को वे बहुत देर से छूते हैं। विशाल ने दरअसल इस फिल्म को एक नुक्कड़ नाटक की तरह बरता है। शायद इसलिए उनकी फिल्म के पात्रों का विकास बहुत देर से होता है और वे खुद को कहानी में अपना परिचय देने के बाद भी स्थिर नहीं रख पाते। मध्यांतर के बाद ही फिल्म कुछ गति लेने के बाद हमसे जुड़ पाती है। फिल्म में चुटीले संवाद हैं और अपने अन्दर के जाले भी साफ़ कर ले, हौन्तेड हाउस लगने लगी है जैसे संवाद याद रहते है . फिल्म में खेतों में घुमाया कैमरा उसे पीले और कथई का शानदार कैनवास बनाता है। सो आप तो एक बार फिल्म जरुर देख लें .
फिल्म क्यों देखें : विशाल की एक और देखने वाली फिल्म है
फिल्म क्यों न देखें : मेरे पास तो ऐसा कोई कारण नहीं हैं
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Section: समीक्षा -
File Under: फिल्म |
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Written by अर्णब बनर्जी on Friday, 30 November 2012 10:21
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आमिर ख़ान की फ़िल्मों का हर सिनेमा प्रेमी को इंतज़ार रहता है. अगर कुछ खास ना हो तो भी सिर्फ़ इस वजह से कि उनका किसी भी किरदार के प्रति पूरा समर्पण होता है. आप सोच रहे होंगे कि विक्रम भट्ट जैसी फ़िल्मों में आमिर क्या कर रहे हैं.
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Section: समीक्षा -
File Under: फिल्म |
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Written by रामकिशोर पारचा on Monday, 05 November 2012 17:53
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रेटिंग - ५/२.५
दो टूक : बात स्वाद की हो या रिश्तों की. उनकी महक का एक रहस्य तो होता ही है और इसे समझना हर किसी के बस की बात भी नहीं है. लेकिन ये समझ आ जाएँ तो बस फिर उलझी हुई जिन्दगी ही सुलझ जाये. निर्देशक समीर शर्मा की कुनाल कपूर, हुमा कुरैशी, विनोद नागपाल, राहुल बग्गा, डॉली अहलुवालिया,विपिन शर्मा, राजेश शर्मा, हैरी टंगरी, राजेंद्र सेठी, सीमा कुशल, मुनीश मखीजा और अनाग्षा बिस्वास के अभिनय वाली फिल्म लव शव ते चिकन खुराना नाम की ये फिल्म भी ऐसा ही कुछ माजरा बुनती है.
कहानी : फिल्म की कहानी ओमी खुराना[ कुनाल कपूर ] नाम के ऐसे युवक की है जो लन्दन में अपनी सपनों की दुनिया बसाना चाहता है. एक दिन वो अपने घर से अपने दादा जी दारजी [विनोद नागपाल] का सारा पैसा चुराकर भाग जाता है. एक दिन जब लन्दन में कर्ज में डूबे जान बचाने को दौड़ते ओमी के पीछे सेंटी [मुनीश मखीजा ] पड़ जाता है तो उसे ना चाहते हुए भी उसे भारत लौटना पडता है. यहाँ उसके जाने के बाद सबकुछ बदल चुका है. दारजी बीमार हैं और उनकी याददाश्त जा चुकी है. उसकी बचपन की दोस्त हर्मन [हुमा कुरैशी] की शादी उसके भाई जीत [राहुल बग्गा] के साथ तय हो चुकी है. उसकी मुसीबत तब शुरू होती है जब सेंटी के आदमी उस से पैसा लेने उसके गाँव आ जाते हैं. ओमी के पास कोई चारा नहीं। अब वो पैसा कमाने के लिए अपने दार जी के एक बंद पड़े ढाबे चिकन खुराना को शुरू करना चाहता है .पर वो नहीं जानता कि इस चिकन डीश का बनाने के लिए नुस्खा क्या है.इसके बाद शुरू होती है उस नुस्खे को पाने की लम्बी कवायद.जिसमे डौली आहलुवालिया,विपिन शर्मा, राजेश शर्मा, हैरी टंगरी, राजेंद्र सेठी, सीमा कुशल, और अनाग्षा बिस्वास पात्र और चरित्र भी शामिल हैं.
गीत संगीत : फिल्म में गीतकार शैली के लिखे गीत हैं और संगीत अमित त्रिवेदी का है.फिल्म चूँकि पंजाबी फ्लेवर के साथ अपनी बात कहने की कोशिश करती है इसलिए उसके गीतोंमें भी पंजाबी लोक शैली का इस्तेमाल किया है. सो आप चाहें तो किकली कालेर दी और लूनी हसी जैसे गीतों को सुन सकते हैं.
अभिनय : फिल्म के केंद्र में कुनाल कपूर हैं और ये पहली बार है जब वो बिना दाढ़ी मूंछों के परदे पर दिखे हैं और अच्छे भी लगे हैं. हालांकि उनके बस में अभियन की बहुत गुंजायश नहीं है पर वो बुरे नहीं लगे.कुछ संवाद अदायगी और सुधार लें तो कुछ और कमाल कर सकते हैं. नायिका बनी हुमा ने बहुत मेहनत की है और एक पंजाबी युवती के पात्र और उसके चरित्र के मनोविज्ञान को उन्होंने सलीके से बुना है.अपनी शारीरिक भाषा में भी और संवाद अद्यागी में भी. राजेन्द्र सेठी और सीमा कुशल ने हमेशा की तरह अपनी अभिनय प्रतिभा के प्रतीक और बिम्ब बुन लिए पर राजेश शर्मा इस फिल्म की उपलब्धि कहे जा सकते हैं जबकि डौली आहलुवालिया,राहुल बग्गा, डॉली अहलुवालिया,विपिन शर्मा, हैरी टंगरी, मुनीश मखीजा और अनाग्षा बिस्वास को बहुत मौका नहीं मिला है.
निर्देशन : समीर शर्मा की यह पहली फिल्म है और उन्हें एक बहुत अच्छी पटकथा मिली. शुरू में फिल्म की गति बहुत धीमी है. पर इसके बावजूद फिल्म की कहानी में हमारी जिज्ञासा बनी रहती है. कहानी के पात्र हमें अपने लगते हैं और एक धोखेबाज नायक और उसके बाद भी उसके लिए प्रेम संजोए प्रेमिका का गुस्सा देखने लायक है.फिल्म को कामेडी का तड़का दिया गया है पर सच मायनों में ये रिश्तों और उनके नए अर्थों को दिखने वाली फिल्म है.फिर भी मेरा मानना है कि फिल्म को विस्तार देने के लिए बेशक समीर ने रोचक घटनाएं जमा कर ली हों पर कलाइमेक्स में उनका डिश बनाने के लिए इस्तेमाल में आने वाली अफीम का रहस्य बहुत प्रभावित नहीं करता.
फिल्म क्यों देखें : रोचक फिल्म है.
फिल्म क्यों ना देखें : फिल्म एक अंत में आपको वो नहीं मिलता जिसके लिए आप पैसा खर्च करते हैं.
रामकिशोर पारचा प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक हैं और मीडिया सरकार के लिए नियमित समीक्षा करते है ।
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Section: समीक्षा -
File Under: फिल्म |
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Written by रामकिशोर पारचा on Saturday, 27 October 2012 18:53
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रेटिंग - ५/२.५
दो टूक : सपने किसके नहीं होते और उन्हें पूरा कौन नहीं करना चाहता. पर उनके पीछे भागकर अपनी आँखों का साथ छोड़ देना ठीक नहीं है. सपने तो फिर भी आपकी आँखों के साथ हो लेंगे.पर अगर आपने आँखों का साथ छोड़ा तो हो सकता है कि सपने भी आपका साथ छोड़ दें. बस इतना सा संदेश देती है निर्देशक शमीन देसाई और प्रियंका देसाई की इमरान हाशमी, सागरिका घाटगे, नेहा धूपिया और आदित्य पंचोली के अभिनय वाली फिल्म रश.फिल्म की कहानी मीडिया, राजनीति, अपराध और रोमांस के इर्दगिर्द घूमती है
कहानी : फिल्म की कहानी सैम ग्रोवर [इमरान हाशमी] नाम के एक पत्रकार की है . सैम का बचपन कड़वाहट और अभाव भरा रहा है. अपनी गर्लफ्रेंड अहाना शर्मा [सागरिका घाटगे] के साथ सैम अपनी जिन्दगी को बेहतर बनाने के सपने देखता है पर उसके लिए वो जो रास्ता चुनना चाहता है वो ठीक नहीं. अपने लोकप्रिय एक शो को बस अपने अंदाज में प्रसारित करने के कारण जब उसे नौकरी से निकल दिया जाता है तो एक न्यूज चैनल क्राइम २४ की लिजा कपूर [नेहा धूपिया] सैम को चैनल में नौकरी देती है. सैम को ज्यादा तनख्वाह, मंहगी कार और शानदार घर मिलता है. लेकिन लीजा की छवि कुछ कुछ ग्रे शेड की है. वह सैम के प्रति आकर्षित होती है और सैम भी उसके साथ हो लेता है. सैम की जिंदगी में तब भूचाल आता है जब एक मीडिया टाइकून रोजर खन्ना [आदित्य पंचोली ] उसे एक काम सौंपता है. उस काम को स्वीकार कर सैम एक खतरनाक दलदल में फंस जाता है.वो इस दल दल से बाहर आना चाहता है पर फंसता ही जाता है. इसकी वजह है लीजा, जो अब रोजर के कारण उसके सामने है.
गीत संगीत : फिल्म में आशीष पंडित, कुमार, सईद कादरी और हार्ड कौर के गीत हैं. पर प्रीतम चक्रवर्ती के संगीत के साथ इन्हें सुनना बुरा नहीं है. दिल तो फुकरा है और ओ रे खुदा जैसे गीत ऐसे ही हैं.हाँ एक गीत है जो मेरी पसंद का है और वो है मुमकिन है. उसे जरुर सुने.
अभिनय : फिल्म के केंद्र में इमरान हाश्मी हैं. वो मेहनत करते हैं पर अब उनके लिए हर फिल्म में कुछ अलग करना मुश्किल होता है. इस फिल्म में भी उनके पात्र और चरित्र के साथ दोहराव बना रहता है पर वो बुरे नहीं दीखते. नेहा धूपिया ग्रे शेड में हैं और वो अपने पात्र को यथार्थवादी बनाने के लिए मेहनत करती हैं पर लम्बे समय बाद दिखी सागरिका घाटगे को कुछ और बेहतर बनाया जा सकता था. आदित्य पंचोली फिल्म में रफ़्तार लाते हैं और उनका पात्र ही फिल्म में बाकी पत्रों को भी विकसित होने मौका देता है पर मुरली शर्मा, आलेख सिंह और राहुल सिंह को सलीके से लिखा जाता तो कुछ और बेहतर पात्र विश्लेषण किया जा सकता था.
निर्देशन : गौर से देखा जाए तो फिल्म की कहानी के विषय में कुछ नया नहीं है पर निर्देशक ने उसे जिस ताजगी और संदर्भ के साथ बरता है वो रोमांचित करता है. ये अलग बात है कि फिल्म की कहानी को गढ़ने के लिए कल्पनाशीलता का बहुतायत से इस्तेमाल किया गया है और इसके चलते फिल्म के विषय के कुछ तथ्य अविश्वसनीय हो गए हैं फिर भी ब्लड मनी जैसी फिल्मों की छाया वाली, संजय मासूम के संवाद, आरिफ शेख के सम्पादन वाली ये फिल्म देखने लायक है.फिल्म में एक्शन दृश्य अच्छे हैं और इमरान के साथ नेहा के कुछ दृश्य भी.आप चाहे तो एक बार फिल्म जरुर देख लें.
फिल्म क्यों देखें : क्राइम थ्रिलर पसंद हो तो.
फिल्म क्यों ना देखें : इमरान की एक रूटीन फिल्म है.
रामकिशोर पारचा प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक हैं और मीडिया सरकार के लिए नियमित समीक्षा करते है ।
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Section: समीक्षा -
File Under: फिल्म |
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Written by मीडिया सरकार on Friday, 26 October 2012 06:37
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पैरेलल सिनेमा से उभरे फिल्मकारों में कुछ चूक गए और कुछ छूट गए। अभी तक सक्रिय चंद फिल्मकारों में एक प्रकाश झा हैं। अपनी दूसरी पारी शुरू करते समय 'बंदिश' और 'मृत्युदंड' से उन्हें ऐसे सबक मिले कि उन्होंने राह बदल ली। सामाजिकता, यथार्थ और मुद्दों से उन्होंने मुंह नहीं मोड़ा।
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Section: समीक्षा -
File Under: फिल्म |
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