क्या लेफ्ट पार्टियों ने केजरीवाल नाम के तोते में छिपा दी है अपनी जान?

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अभिरंजन कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

केजरीवाल ने राइटविंगर गांधीवादी अन्ना हज़ारे, लेफ्टविंगर मानवाधिकारवादी प्रशांत भूषण, कांग्रेसप्रेमी समाजवादी योगेंद्र यादव, भाजपा-प्रेमी राष्ट्रवादी किरण वेदी- सबको एक साथ ‘यूज़’ कर लिया और वक़्त आने पर ‘थ्रो’ भी कर दिया।

मज़े की बात है कि गांधीवादियों, समाजवादियों, राष्ट्रवादियों सबका उनसे मोह भंग हो चुका है, लेकिन हमारे लेफ्ट के कई साथी अब भी केजरीवाल नाम का ढोल पीट रहे हैं। अब भी वे उन्हें नई राजनीति का अगुवा, आदर्श राजनीतिक मूल्यों का रखवाला वगैरह न जाने क्या-क्या कह रहे हैं।

ऐसा अगर केजरीवाल के वेतनभोगी कार्यकर्ता कहते हैं, तो समझ में आता है, लेकिन हमारे लेफ्ट के साथी ऐसा क्यों कहते हैं? देखें तो लेफ्ट के बड़े नेता भी आम तौर पर केजरीवाल की आलोचना नहीं करते, जबकि प्रायः सभी दलों के नेता उनके प्रति हमलावर ही रहते हैं।

तो क्या यह समझा जाए कि अगर अन्ना आंदोलन को छिपा समर्थन देकर आरएसएस ने ‘मास्टर स्ट्रोक’ खेला था, तो केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी बनवाकर लेफ्ट ने ‘सुपर मास्टर स्ट्रोक’ खेला था? चूंकि लेफ्ट को यह समझ आ रहा था कि भारतीय राजनीति में वे अप्रासंगिक हो गए हैं, तो क्या चुपके से उन्होंने केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी खड़ी करवाई?

बारीकी से देखें, तो सभी विचारधाराओँ के लोग केजरीवाल से छिटक चुके हैं, लेकिन नक्सली नेताओं से उनका जुड़ाव और नक्सली नेताओं का उनसे जुड़ाव अब भी कायम है। केजरीवाल सबकी आलोचना करते हैं, लेकिन लेफ्ट पार्टियों और नक्सलवादियों-माओवादियों के ख़िलाफ़ कभी एक शब्द नहीं बोलते।

बीजेपी के नेता सुब्रह्मण्य स्वामी तो खुलकर अरविंद केजरीवाल को नक्सलवादी कहते हैं। स्वयं अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते हुए 2014 की छब्बीस जनवरी से ठीक पहले राजपथ पर होने वाली गणतंत्र दिवस परेड के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी।

रेल भवन पर धरना देते हुए उस वक्त उन्होंने खुलकर अपने को ‘अराजकतावादी’ बताया था और देश के इतिहास में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने गणतंत्र दिवस की झांकियां न निकलने देने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था- “हम यहां धरना जारी रखेंगे और यह सबसे अच्छा गणतंत्र दिवस होगा। गणतंत्र दिवस के दिन कोई झांकी नहीं होगी, लेकिन (केंद्र) सरकार को सड़कों पर जनता नजर आएगी।”

तब भी यह सवाल उठा था कि क्या देश का कोई भी ज़िम्मेदार और लोकतांत्रिक व्यक्ति 15 अगस्त और 26 जनवरी के कार्यक्रम बाधित करने के बारे में सोच सकता है? लेकिन केजरीवाल ऐसा सोच सकते थे। इससे यह संदेह पुख्ता हुआ था कि वे नक्सलवादी विचारधारा से बुरी तरह प्रभावित हैं।

बचपन में हमने कई कहानियों में पढ़ा था कि कुछ ‘ख़ास तरह की शक्तियां’ अपनी जान किसी “तोते” में छिपा दिया करती थीं, ताकि कोई उन्हें मार न पाए। …तो क्या लेफ्ट पार्टियों ने भारतीय राजनीति में अपनी आसन्न मृत्यु को देख अपनी जान केजरीवाल नाम के “तोते” में छिपा दी है?