आरा की अनारकली देखिए, सलीम की अनारकली भूल जाएंगे

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अनारकली नाचती है, गाती है और झमाझम गाती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसको आप बजा देंगे। समझते हैं न आप बजाने का मतलब। स्वरा के दमदार अभिनय, अविनाश दास और सहयोगियों के सधे हुए डायलॉग और अविनाश दास के निर्देशन ने दरअसल जोर का डंका बजाया है।

फिल्म में कई खास बाते हैं लेकिन फिल्म की ओपनिंग और फिल्म का क्लाइमेक्स जबरदस्त है। हाल के दिनों में कई फिल्मों का सुंदर क्लाइमेक्स देखा है हमने, सुखांत भी और दुखांत भी लेकिन ऐसी धमाकेदार ओपनिंग काफी समय बाद देखने को मिला है, शायद वासेपुर के बाद।कई फिल्में देखने के बाद दर्शक यह सोचने लगता है कि इस रोल में फलां अदाकार होता तो कैसा होता और कई फिल्में यह बताती हैं कि जैसे यह रोल लिखा ही गया है इसी अदाकार के लिए। तो हुजूर अनारकली का किरदार लिखा ही गया है स्वरा के लिए । स्वरा के बेहतरीन अभिनय के लिए साधुवाद। पंकज और स्वरा की केमिस्ट्री भी जबरदस्त है, निल बटे सन्नाटा से एक कदम आगे। फिल्म देखकर कहीं से यह नहीं लगता है कि फिल्मकार की निर्देशित यह फिल्मी है और इससे पहले निर्देशक ने बतौर सहायक भी काम नहीं किया इतना ही नहीं निर्देशन की कोई विधिवत शिक्षा भी नहीं ली। अविनाश दास को इसके लिए इश्क वाला आदाब।

अविनाश ने अपनी फिल्म के जरिेए एक सच्ची घटना को आधार बनाते हुए बड़ा संदेश दिया है, ठीक वैसा ही जैसा अमिताभ अभिनीत हालिया फिल्म पिंक में था। नो मतलब नो । और यह संयोग ही है कि अविनाश दास ने जिस आरा को फिल्म का बैकग्राउंड बनाया है, द्विअर्थी भोजपुरी गानों के लिए उसी आरा से अभिनतेता सत्यकाम आनंद अश्लील गानों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैँ। दरअसल डबल मीनिंग और अश्लील गानों में बारीक नहीं बहुत मोटा फर्क होता है और इसे भी अविनाश दास ने मजबूती से पकड़ कर रखा है। महिला सशक्तिकरण जैसी संदेश वाली बातें इस फिल्म के लिए छोटी है। नाचनेवालियों पर दर्जनों फिल्में बनी हैं और हर फिल्म में उसका प्रतिकार भी रहा होगा एकसमान लेकिन आपके इगो पर ठेस पहुंचा कर धक्क से कर देने से आप शायद ही रु-ब-रु हुए होंगे।

युवा दर्शकों के लिए अविनाश ने दो किरदार गढ़े हैं एक अनारकली औऱ दूसरा हीरामन। फिल्म चाहनेवालों को सलीम की अनारकली याद होगी लेकिन तीसरी कसम का हीरामन एक बार फिर अविनाश के जरिए पर्दे पर है। जबरदस्त । इस युवा अभिनेता में काफी संभावनाएं हैं। सौरभ शुक्ला, राजपाल यादव और रघुबीर यादव सरीखा या कहें कि उससे एक कदम आगे का अभिनेता है यह शख्स। फिल्म इंडस्ट्री को अविनाश की यह देन है।

फिल्म का संगीत और झमाझम हो सकता था, गुंजाइश थी और कोशिश भी बेहतरीन है। संजय मिश्रा मौजूदा दौर के ऐसे कलाकार हैं कि सिर्फ उनको देखने के लिए भी हम जैसे लोग थिएटर जा सकते हैं बशर्ते कि काम सिर्फ पैसे कि लिए नहीं किया हो। संजय मिश्रा ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है, हां उनका पहनावा थोड़ा लाउड है, वो बेहतर हो सकता था।

और अंत में मित्र संदीप कपूर को दो दो बार इश्क वाला आदाब कि ऩए निर्देशक के साथ इस किस्म के विषय पर फिल्म बनाने का रिस्क लिया । जब तक संदीप जैसे फिल्म के चाहने वाले मौजूद हैं अविनाश सरीखे फिल्मकार अपनी छाप छोड़ते रहेंगे। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आप हमारे लिए नहीं, अपने लिए नहीं देस के लिए यह फिल्म एक बार जरुर देखिए। वाकई मजा आ जाएगा।

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