अब नीतीश-कांग्रेस में तनातनी, नोटबंदी ने बदले समीकरण, हो सकते हैं अलग

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नीतीश कुमार के नोटबंदी को समर्थन दिए जाने और इस कड़े फैसले के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ किए जाने के बाद बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया है। मीडिया सरकार ने सबसे पहले इस बाबत जानकारी दी कि बिहार की राजनीति में नोटबंदी के बहाने कुछ पक रहा है। नीतीश कुमार के इन तेवरों से महागठबंधन के उऩके दोनों सहयोगी नाराज और परेशान हैं। लालू यादव अभी तक खुलकर नोटबंदी का विरोध कर रहे थे लेकिन उनके सुर भी नीतीश कुमार के पक्ष में ही जाते दिख रहे हैं।

नोटबंदी के विरोध में आम जनता को होनेवाली परेशानियों के बहाने कांग्रेस लगातार नरेंद्र मोदी औऱ सरकार पर हमले कर रही है, ऐसे में उनके सबसे मजबूत सहयोगी दल के नेता और बिहार के मुखिया का अलग झुकाव जाहिर तौर पर परेशान कर रहा होगा। पिछले दिनों कांग्रेस को अपने आक्रोश रैली को पर्याप्त समर्थन के अभाव में आक्रोश दिवस के रुप में बदलना पड़ा था। २८ नवंबर को अघोषित तौर पर देशबंद की तैयारी थी और मीडिया के एक धड़े और सोशल मीडिया के जरिए ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई कि देश की जनता बंद में शरीक होना चाहती है। नोटबंदी के बीस दिन बीत जाने के बाद भी अच्छे दिनों की चाहत में इंतजाररत और किंकर्तव्यविमूढ़ भारत की जनता ने बंद का विरोध किया औऱ नोटबंदी का साथ दिया। ऐसे में कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ने लगी।

नीतीश कुमार के नोटबंदी के समर्थन को साफ तौर पर बीजेपी की तरफ झुकाव के तौर पर देखा गया औऱ उसका आधार भी स्पष्ट था। सत्ता में आने के बाद से नीतीश कुमार के फैसले और महागठबंधन के दूसरे सहयोगियों का कार्यकलापों पर नजर दौड़ाएं तो साफ होता है कि नीतीश कुमार जबरिया विवाह की तर्ज पर गठबंधन का साथ निभा रहे हैं।  उधर कांग्रेस का मानना है कि नीतीश असल में 2019 के लोकसभा चुनाव को दिमाग में रखते हुए ही नोटबंदी के फैसले का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि नीतीश कुमार के बदले तेवरों से नाराज कांग्रेस ने कहा कि गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए केवल एक ही उम्मीदवार चुना जा सकता है। कांग्रेस का साफ तौर पर यह मानना है कि विपक्ष जहां संगठित तौर पर नोटबंदी के खिलाफ खड़ा हुआ, वहीं नीतीश अगले आम चुनावों के मद्देनजर अपनी एक स्वतंत्र छवि बनाने के लिए ही साथ नहीं आए।

बिहार चुनाव से पूर्व जब महागठबंध की कवायद चल रही थी कि तो एकबार मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर बातचीत लगभग टूट चुकी थी लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश के नाम पर सहमति बनी। ऐसे में नीतीश के बदले सुर से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। यही राजनीति का दस्तूर है और अब शायद इसी कारण कांग्रेस भविष्य में खासतौर पर 2019 के आम चुनावों को लेकर कोई गलती नहीं करना चाहती।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘नोटबंदी के खिलाफ हमारा विरोध काफी अहम है। हमारी ओर से इसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं और हमें हमारे एक विश्वस्त नेता की ओर से झटका मिला है। इससे हमें दुख हुआ है।’ कांग्रेस के अंदरखाने में अब इस बात की चर्चा होने लगी है कि क्या उन्हें अब नीतीश कुमार से अलग अपना रास्ता बना लेना चाहिए। बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चौधरी ऐसे संकेत पिछले दिनों कई बार दे चुके हैं। अशोक चौधरी का मानना है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीति की दिशा राज्य से मोड़कर केंद्र की ओर लाना चाहते हैं। ऐसे में कांग्रेस को सोच समझकर आगे बढ़ना होगा।

कांग्रेस का यह भी मानना है कि ‘एक ही गठबंधन से दो नेता (राहुल गांधी और नीतीश कुमार) प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनकर बिहार की जनता से वोट नहीं मांग सकते। ऐसे में आनेवाले दिनों में तल्खी और बढ़ने के आसार हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि नीतीश के पास बिहार की महागठबंधन सरकार से अलग जाने के कई कारण हैं। नीतीश को बार बार लग रहा है कि शासन में उनकी मनमानी नहीं चल रही है। ताजा कारण तो यह है कि वो प्रदेश कॉर्पोरेशन्स के अध्यक्ष पदों पर ज्यादा संख्या में अपने लोगों को नियुक्त करना चाहते है लेकिन कांग्रेस और आरजेडी पारदर्शिता चाहती है। इसके अलावा शासन से संबंधित कई मुद्दों पर भी नीतीश लालू के साथ दूरी बनाना चाहते हैं। हालांकि मंगलवार को ही नीतीश और लालू ने मुलाकात की और इसके बाद लालू ने भी नोटबंदी के साथ होने की बात कही है। लालू के इस बदले रुख पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया ही अब बिहार की अगली राजनीतिक दिशा तय करेगी।