पिताजी की महफिल में रतजगा है, क्या होंगे चाचा चित और पापा पट !

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Anuranjan Jha, CEO, Media Sarkar

आज की रात कयामत की रात है, समाजवादी पार्टी के लिए, मुखिया मुलायम सिंह यादव के लिए। पार्टी के लड़ाके शिवपाल यादव के लिए और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए। उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनाव दिलचस्प होता है लेकिन हमने पहले भी कई बार कहा है कि इस बार प्रदेश का चुनाव पूर्व के मुकाबले काफी मनोरंजक रहने वाला है।

एक तरफ सभी पार्टियां अलग अलग तरीके से अपनी ताकत झोंक रही हैँ। राहुल गांधी की दो दौर की किसान खाट यात्रा पूरी हो चुकी है । बीजेपी परिवर्तन यात्रा शुरू करने वाली है, मायावती दलितों के बोट बैंक अपना एकाधिकार का खयाल रखते हुए मंच से मुसलमानों को रिझाने में लगी है लेकिन चर्चा तो प्रदेश में सिर्फ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ही है।

पिछले एक डेढ़ महीने की बानगी देखिए- अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव को मंत्रीपद से हटाया, अखिलेश यादव से नेताजी मुलायम सिंह नाराज, अखिलेश ने पिताजी के सामने घुटने टेके, मुखिया मुलायम ही चलाएंगे पार्टी, अखिलेश का यू टर्न शिवपाल कैबिनेट में, अखिलेश अमर सिंह से नाराज, चुनाव बाद तय होगा मुख्यमंत्री, अखिलेश होंगे चेहरा , अखिलेश ने शिवपाल को फिर बर्खास्त किया और न जाने क्या क्या फेहरिस्त काफी लंबी है। चर्चा के केंद्र में बस अखिलेश यादव हैं। मीडिया में बस उत्तर प्रदेश की चर्चा है, उत्तर प्रदेश में बस अखिलेश की चर्चा है। उस अखिलेश यादव के लिए भी यह कयामत की रात है।

पांच साल पहले जब मायावती की पार्टी को धूल चटा कर प्रचंड बहुमत से समाजवादी पार्टी सत्ता में आई तो देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव की ताजपोशी हुई। जैसा कि पिछले पच्ची सालों में जब जब पार्टी सत्ता में आती रही तो प्रदेश में अपराध और गुंडई बढ़ती रही, इस बार भी हुआ। शुरु के एक साल तक मुखिया मुलायम के इशारे पर शिवपाल यादव सरकार चलाते रहे और अखिलेश सत्ता की राजनीति को समझने में लगे रहे। जब अखिलेश यादव से लगाई जनता की उम्मीदें धुमिल पड़ने लगी और गाहे-बेगाहे असफलता का ठप्पा लगने लगा तो अखिलेश की नींद खुली। जब तक अखिलेश की नींद खुली तब तक शिवपाल यादव और आजम खान सरीखे नेता पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा चुके थे। अहसास होते होते २०१४ का लोकसभा का चुनाव आ गया और तब तक कुछ खास न कर पाने का खामियाजा मोदी लहर के साथ ऐसा मिला कि पार्टी अपने परिवार के अलावा सभी सीटें हार गई ।

अखिलेश के लिए यह एक जोर का झटका था और इस युवा मुख्यमंत्री को अब यह यकीन हो चुका था कि समाजवादी कुनबे की ढांचागत राजनीित से तो बेड़ा ही गर्क होगा । लिहाजा अखिलेश यादव ने अपने हिसाब से सरकार और पार्टी चलाना शुरु किया, निस्संदेह प्रदेश में कई नई योजनाएं लागू कीं,  सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर किया जाने वाला काम दिखने लगा लेकिन अब भी अपराध और भ्रष्टाचार को काबू में करना एक चुनौती से कम नहीं था। अखिलेश को शायद यह भी अहसास हो चुका था कि भ्रष्टाचार की डोर कहीं न कहीं समाजवादी पार्टी के अहाते से ही निकलती है। मुख्यमंत्री को बार बार बच्चा कहने कहने वाले चचाजान आजमखान को सबसे पहले अखिलेश ने गच्चा दिया और एकदम से सीमित कर दिया। एक बार तो आजम खान की ऐसी हालत हो गई कि पार्टी से जाते जाते रह ही गए थे बस ।

इधर धीरे धीरे अपने काम और उसके प्रचार के बल पर अखिलेश यादव ने छ महीने में अपनी खोई ताकत को पाने जैसा अहसास किया होगा। एक साल पहले जहां प्रदेश में पोल पंडितों को  मायावती स्वीप करती नजर आ रही थी, पिछड़ने लगी और अखिलेश का ग्राफ बढ़ने लगा। लेकिन इस बीच अपने को सत्ता के केंद्र से दूर पाकर न तो आजम खान खुश नजर आ रहे थे और न ही शिवपाल यादव। शिवपाल की महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगी थीं और उनकी दिली तमन्ना यह भी रही हो कि अखिलेश यादव फेल हो जाएं तो सत्ता की बागडोर उनके हाथ में आ जाए। लेकिन यहंा तो अखिलेश यादव माननीय मुलायम सिंह यादव के पुत्र ठहरे।

दरअसल हमें लगता है कि मुलायम सिंह यादव सरकार की सारी एंटी एनकमबेंसी फैक्टर, करप्शन और क्राइम को शिवपाल और उनके सहयोगियों के मत्थे मढ़कर बेटे अखिलेश यादव को बेदाग दूसरी पारी देना चाहते हैँ। अखिलेश भी इस बार साढ़े तीन मुख्मंत्रियों वाली सरकार चलाना नहीं चाहते। लिहाजा रास्ता जरा टेढ़ा है। टेक्नॉलाजी के इस जमाने में खतो-इबादत हो रही है। मुलायम सिंह अखिलेश को पत्र लिख रह हैं, अखिलेश पार्टी प्रमुख को अपनी दिनचर्या पत्र के जरिए बता रहे हैं और इसबीच प्रोफेसर रामगोपाल यादव भी अपनी बात रखने के लिए चिट्ठियों का सहारा ले रहे हैँ।

सबका मकसद दूसरी बार एक बार फिर सत्ता में आना है। साम-दाम-दंड-भेद कैसे भी हो अखिलेश मात नहीं खाना चाहते। दूसरी पार्टियों की चाहे कितनी भी योजनाएं हो, कितनी भी रैलियां हो, चाहे कितने तरह के सर्जिकल स्ट्राइक हो प्रदेश में चर्चा तो सिर्फ अखिलेश यादव की ही हो रही है।

मुखिया मुलायम अपने परिवार और पार्टी के सभी नेताओं के गुरु हैं। लोहिया के इस लंबरदार ने अपने किस चेले को कितने दांव सिखाएं हैं वो तो वही जानते हैं, और क्या अपने बेटे को सारे दांव सिखा गए हैं या गुरु का दांव बचाकर रखा है क्योंकि फिलहाल तो अखिलेश यादव ने एक ही धोबिया पाट में चाचा को चित और पापा को पट कर दिया है।

आज शाम पार्टी नेताओँ और मंत्रिमंडल से बर्खास्त शिवपाल यादव के साथ लंबी गहन चिंता के बाद जब मुलायम बाहर निकले तो पहली बार उनके चेहरे कुछ कहानी बयान कर रहे थे, मीडिया से उन्होंने अगली सुबह तक इंतजार करने को कहा । अगली सुबह अगर गाज अखिलेश पर गिरती है तो उसका भी लाभ अखिलेश को मिलेगा। अगर पार्टी टूटती है तो उसका भी लाभ अखिलेश को मिलेगा और अगर अपने विरोधी को धूल चटा कर अखिलेश बाहर आते हैं तो कहना ही क्या । अब सबकी नजर नेताजी पर है क्योंकि नेताजी तो पिताजी हैं और सुना है पिताजी की महफिल में रतजगा है।