2010 में होनी चाहिए थी प्रणव रॉय पर कार्रवाई

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NDTV के कर्ता-धर्ता प्रणव रॉय और उऩकी पत्नी (वृंदा करात की बहन) राधिका रॉय पर सीबीआई के छापे के बाद सोशल मीडिया में इसे जो लोग अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बता रहे हैं वो ना तो एनडीटीवी के इतिहास से परिचित हैं औ न हीं उऩको नीरा राडिया औऱ बरखा दत्त का प्रकरण याद है। जो अब हुआ है दरअसल वो आज से सात साल पहले होना चाहिए था। 2010 में जब नीरा राडिया और बरखा-वीर का गठजोड़ सबसे पहले सामने आया उसी वक्त इन सारे मामलों की मुकम्मल जांच होनी चाहिए थी। अब तो यह जांच भी होनी चाहिए कि पहले सीबाआई के मामले क्यूं बंद कर दिए गए। हम आपको कुछ बानगी याद दिलाते हैं।
 
दिसंबर 2010 में प्रणव राय का सच बताया था आलोक तोमर ने –
 
एनडीटीवी के पास पैसे हैं और फिर बरखा दत्त हैं जिनकी दोस्ती टाटाओं और राजाओं से हैं इसलिए उनकी मर्जी, वे जहां भी खर्च करें।
 
मूल खबर एनडीटीवी के शेयरों को नकली और बढ़े-चढ़े दामों पर बेचने की थी। भारत में इन शेयरों का हाल सबको पता था इसीलिए ये शेयर कौड़ी के दाम भी नहीं बिके, मगर विदेशों में बेचने के लिए और बैंक से इनके बदले मोटा कर्ज लेने के लिए दाम बढ़ाए गए। प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका की आर आर आर आर होल्डिंग जो एक लाख रुपए की कंपनी हैं, उसे आईसीआईसीआई इन शेयरों के नाम पर 375 करोड़ रुपए दे दिए जबकि इन शेयरों का कुल दाम इस समय भी 47 करोड़ से ज्यादा नहीं था। जो पैसा लिया गया उनमें से 73 करोड़ तो ऐसा था जिसे वापस नहीं भी करने से काम चल जाता। बैंकिंग की भाषा में इसे अन सेक्योर्ड लोन कहते हैं। एनडीटीवी की कई सहायक कंपनियां भी शेयरों की खरीददार बताई गईं मगर एनडीटीवी की बैलेंस शीट में इन कंपनियों का कहीं कोई नाम नहीं है। ऐसे बैलेंस शीट देने के लिए वित्त मंत्रालय और कंपनी पंजीयक की अनुमति जरूरी होती है, लेकिन प्रणय रॉय ने पहले बैलेंस शीट दाखिल कर दी और उसके दो दिन बाद अनुमति प्राप्त की। मतलब यह कि एनडीटीवी की कम से कम एक बैलेंस शीट फर्जी है।
 
फर्जी होने के सबूत नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय और लंदन के कंपनी हाउस तक बिखरे पड़े हैं। लंदन की एक कंपनी के जरिए जो शेयर बेचे गए उनका कोई हिसाब ही नहीं है। आंकड़े गलत, आंकड़ों के निष्कर्ष गलत, शेयर बेचने की शर्ते गलत और शेयर खरीदने वालों से किए गए वायदे गलत। प्रणय रॉय आप तो ऐसे न थे। एमजे अकबर और उनकी टीम ने जब पूरी रिसर्च कर के यही सब छाप दिया तो अब आपको मिर्चें लग रही है। दौलत की बारिश हो चुकी है, आपको तो गाना चाहिए- बरखा रानी जरा जम के बरसो।
 
अब अगर धोखाधड़ी का पर्दाफाश करने से किसी की इज्जत चली जाती हैं तो इसका कोई इलाज किसी के पास नहीं है। उस इज्जत का दाम कितना है यह भी वे तय करें जो चुकाने वाले हों। अभी तक अपनी राय में एनडीटीवी और खास तौर पर प्रणय रॉय की इज्जत इससे कहीं ज्यादा कीमती थी। मगर जब प्रणय बाबू और खास तौर पर उनके वकील दुनिया को झूठा साबित करने की जिद में कानूनी नोटिसों का सहारा लेने लगे तो उसका जवाब तो फिर ऐसा ही हो सकता है, जैसा यहां लिखा गया है। एमजे अकबर पुराने जुझारू हैं और बड़ों-बड़ों से निपट चुके हैं।
दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर के फेसबुक वॉल औऱ डेटलाइन इंडिया से साभार  
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