रोशनी के त्योहार पर चकाचौंध से बचें, चाइनीज़ सामान न ख़रीदें

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अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, चिंतक और कवि हैं।
अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, चिंतक और कवि हैं।

दोस्तो, दिवाली रोशनी का त्योहार है। चकाचौंध का त्योहार नहीं है। रोशनी हमें रास्ता दिखाती है, जबकि चकाचौंध हमें रास्ते से भटका देती है, कई बार अंधा भी बना देती है। दीयों से रोशनी होती है, जबकि चाइनीज़ लड़ियों और झालरों से चकाचौंध पैदा होती है।

देखा यह जा रहा है कि चाइनीज़ झालरों और लड़ियों की चकाचौंध में प़ड़कर लोग दिवाली से कई दिन पहले ही अपने घरों, मोहल्लों, सोसाइटियों, दफ्तरों, बाज़ारों इत्यादि को सजा देते हैं, जिससे दिवाली वाले दिन कुछ भी स्पेशल करने को नहीं रह जाता। इतना ही नहीं, दिवाली बीत जाने के कई दिन बाद भी ये लड़ियां और झालरें लगी रहती हैं, जिससे दिवाली के दिन की अहमियत कम होती जा रही है।

पहले हम लोग अमावस की रात को महसूस कर पाते थे। अंधेरे आसमान में सितारों की टिमटिमाहट से रोमांचित होते थे। फिर दिवाली के दिन घर के मुंडेरों और दरवाज़ों पर कतारों में सजाकर दीये जलाते थे, जिनसे रोशनी के वो काफिले तैयार होते थे, जो अमावस की रात में हज़ारों-लाखों चांद लगा दिया करते थे।

कितना अच्छा लगता था, जब हम और हमारे बच्चे कंदीलें बनाते थे। अपने हाथों से रंगीन काग़ज़ों और पन्नियों से झालरें बनाते थे और फिर घर के चारों तरफ़ उन्हें सजाते थे। लेकिन अब इन चाइनीज़ झालरों और लड़ियों ने हमसे अमावस की रातें भी छीन ली हैं और चांद-सितारों की बातें भी छीन ली हैं। अब हम कुछ बनाते भी नहीं। बना-बनाया बाज़ार से ख़रीद लाते हैं। त्योहारों के प्रति हममें पहले जैसे कमिटमेंट भी नहीं रह गए हैं।

इसलिए मुझे लगता है कि असली दिवाली हर साल हमसे दूर होती जा रही है, और नकली दिवाली मनाने में ही हम अपनी शान समझने लगे हैं। हम रोशनी नहीं, चकाचौंध के पीछे भाग रहे हैं। वास्तव में अंधकार से लड़ते-लड़ते हम अंधे होते जा रहे हैं। ज्ञान, सादगी और समझदारी की रोशनी का गला घोंट दिया है हमने।

यद्यपि ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमारे समाज की सांस्कृतिक चेतना लगातार मरती जा रही है, लोग अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं और हर बात में शॉर्टकट तलाशने लगे हैं। फिर भी अगर असली दिवाली के गुम होते जाने के लिए चाइनीज़ सामानों का बढ़ता चलन ज़रा भी ज़िम्मेदार है, तो इनका बहिष्कार होना ही चाहिए। चाइनीज़ सामान न तो टिकाऊ हैं, न बेहतर हैं, न पर्यावरण के लिए ठीक हैं।

लेकिन दुर्भाग्य कि चाइनीज़ सामानों के बहिष्कार के लिए चलाए जा रहे अभियान के बावजूद ज़्यादातर दुकानदार चाइनीज़ सामान ही बेच रहे हैं। एक तो भारतीय सामान वे रखते नहीं, अगर रखते भी हैं, तो बहुत थोड़े। ऊपर से चाइनीज़ सामानों के बहिष्कार को नाकाम करने के लिए वे भारतीय सामानों की मनमानी कीमत मांग रहे हैं।

चीन का मीडिया हम पर हंस रहा है। इसलिए हंस रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि चीनी सामानों का इस्तेमाल किए बिना भारत दिवाली मना ही नहीं सकता। ऐसे में ज़रूरी है कि यह दिवाली हम लोग जितनी सादगी से मना सकते हैं, मनाएं। मिट्टी के दीये जलाएं। कंदीलें बनाएं। ख़ुद से झालरें बनाएं। रंगोली सजाएं। यकीन मानिए, बच्चों के लिए ये काम काफी रोचक हो सकते हैं और ऐसा करके वे उत्साह से भर उठेंगे।

इसलिए आइए, देसी सामानों और देसी परम्पराओं के मुताबिक इस बार हम बिल्कुल देसी दिवाली मनाएं। रोशनी के त्योहार पर चकाचौध से बचने के लिए सबको ढेर सारी शुभकामनाएं।