1000 रुपये में वोट बेचेंगे तो लोकतंत्र की लाश भी ढोएंगे

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दो दिन पहले उड़ीसा से एक हृदयविदारक तस्वीर आई , पैसे नहीं होने के कारण दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश चटाई में लपेट, कांधे पर लाद १२ किलोमीटर तक पैदल चलता रहा। इस तस्वीर ने भाई आलोक तोमर के “हराभरा अकाल” की याद दिला दी। साथ ही इस तस्वीर की तुलना वरिष्ठ पत्रकार मित्र अविनाश दास ने १९९३ में खींची गई केविन कार्टर के सूडान के अकाल वाली उस चित्र से कर दी जिसे पुलित्जर पुरस्कार मिला अगर आपको याद हो तो एक भूख और अकाल का शिकार मासूम बच्चा मौत की आगोश में जा रहा है और एक गिद्ध उसपर नजर टिकाए है शायद वो उसके मरने का इंतजार कर रहा था हालांकि पुलित्जर जैसा पुरस्कार पाने के बाद एक अजीब से दर्द और उलझन में केविन ने आत्महत्या कर ली थी। जिसे उसका अपराधबोध माना गया। उड़ीसा वाली तस्वीर पर भी हम सब पत्रकार अपनी कलम की स्याही उड़लेने में लगे हैं। हालांकि युवा पत्रकार निमिष कुमार ने अपने तईं इस मामले को उठाने के लिए प्रशासन के नाक में दम जरुर किया है। लेकिन मेरे में कुछ अलग किस्म के सवाल उठ रहे हैं। आपको क्या लगता है कि यह हाहाकार उचित है। क्या आपको नहीं लगता कि देश के हर मेट्रो शहर में भी अस्पताल में इलाज के नाम पर जिस किस्म की लूट खसोट हो रही है, हाल ही में पटना में एक मरीज के मर जाने के बाद अस्पताल इलाज करता रहा ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले केविन की तस्वीर वाले गिद्ध से क्या कमतर हैं। पत्रकारों द्वारा ऐसी तमाम खबरें पब्लिक डोमेन में लाई जाती है फिर नतीजा वही ढाक के तीन पात। अब ताजा बानगी देखिए अभी इस तस्वीर की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक और तस्वीर उसी राज्य से आई है एक शख्स ने लाश को बोरी में भरने की पैरों से रौंदकर उसकी कमर तोड़ डाली है। गौर कीजिए इन सारी घटनाओँ पर और चिंता कीजिए दरअसल कमर लाश की नहीं तोड़ी गई बल्कि लोकतंत्र की तोड़ी जा रही है। लेकिन क्या यह सच नहीं कि जो हो रहा है वो हमारे ही कर्मों का नतीजा है। जब हम अपने वोट पांच सौ हजार रुपए में बेचेंगे तो हमें अपनो की लाश अकेले कंधे पर ही उठाना होगा। जब हम अपने वोट शराब के लिए बेचेंगे तो अपनों की लाश की कमर तोड़नी पड़ेगी। जब हमने अपे वोट जात-पात पर बेचेंगे तो मरे हुए मरीज की छाती पर बैठ डाक्टर उसे जिंदा करने की कोशिश करता रहेगा और हम चिल्लाते रहेंगे क्योंकि उस अस्पताल का रहनुमा सत्ता के करीब होगा। और हां यह कहानी सिर्फ कालाहांडी की नहीं है यह दिल्ली में भी हो सकता है । कुछ ही वक्त पहले एक पत्रकार के पिता की असमायिक मौत पर दिल्ली में रहने वाले उसकी सोसायटी में चार लोग कंधा देने के लिए नहीं मिले ये हकीकत हमारे आईआईएमसी के एक मित्र ने पिछले रविवार को ही बयान किया था। वक्त है अब भी चेतने का नहीं तो देश तो बदल ही रहा है ।

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