सेना के मनोबल को गिराते ‘पापी’ नेता!

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लेखक 'मीडिया सरकार' के प्रधान संपादक हैं।
लेखक ‘मीडिया सरकार’ के प्रधान संपादक हैं।

हम शर्मिंदा है! राजनीति के भोंपूबाजों को छोड़ दें तो पूरा देश शर्मिंदा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि भारतीय सेना की एक रणनीतिक सैन्य कार्रवाई ‘लक्षित हमला’ (सर्जिकल स्ट्राइक) को महिमा मंडित करने के क्रम में देश को विचारधारा के आधार पर विभाजित कर डाला गया हो। यही नहीं, जिस रूप में इस ‘शौर्य’ का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है, उससे सिर्फ सेना का मनोबल ही नहीं, उनका अनुशासन भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता दिखने लगा है। राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए यह एक खतरनाक घटना विकासक्रम है।

पिछले दिनों पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर हमारी सेना के जवानों ने अकस्मात हमला कर उनके अनेक केंद्रों को ध्वस्त कर डाला। लगभग पांच दर्जन पाक सैनिक भी हताहत हुये। भारत सरकार की ओर से इसे पठानकोट-उरी हमलों के खिलाफ बदले की कार्रवाई बताया गया। आक्रोशित भारत के लोग ऐसी किसी कार्रवाई की पतीक्षा कर रहे थे। आक्रोश की तीव्रता और आम लोगों की आकांक्षा को देखते हुए प्रधानमंत्री के स्तर पर निर्णय ले लक्षित हमले को अंजाम दिया गया। भारत में सर्वत्र इस कार्रवाई का स्वागत हुआ। लेकिन, जब पाकिस्तान की ओर से बार-बार ऐसी किसी कार्रवाई का खंडन किया गया, तब घोर राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय देते हुए विपक्ष के कुछ राजनेताओं ने हमले के सबूत पेश किये जाने की मांग कर डाली। हालांकि, मांग का आशय था कि पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब कर दिया जाए, किंतु गंदी राजनीति ने इसे तूल दे डाला। तिल का ताड़ बना डाला गया। वास्तविकता से इतर अपने घर के अंदर ही युद्ध का एक नया मोर्चा खोल दिया गया। ऐसा नहीं होना चाहिए था।

पूरे प्रकरण का सबसे दु:खद पहलू यह कि विपक्ष तो विपक्ष स्वयं सत्तारुढ़ राजदल ने भी इस मुद्दे को कुछ इस रूप में उछाला कि उन्हें आने वाले चुनाव में इसका राजनीतिक लाभ मिले। यह दु:खद एवं आश्चर्यजनक है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से राजनीतिक लाभ उठाने के लिए इसे जीवित रखने संजीवनी की व्यवस्था न केवल निम्न व मध्यवर्ग के राजनेता कर रहे हैं, बल्कि स्वयं देश के प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री भी कर रहे हैं। राजनीतिक लाभ उठाने के आरोप का बचाव करते हुए सत्ता पक्ष की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि जब 1971 में युद्ध का राजनीतिक लाभ तब के सत्तापक्ष कांग्रेस ने उठाया, तब आज की सत्ताधारी भाजपा क्यों न उठाए? समझ की बलिहारी! 1971 में भारत पाकिस्तान के बीच घोषित व निर्णायक युद्ध हुआ था। भारत ने पाकिस्तान का अंग-विच्छेद कर भूगोल बदल डाला था। पूर्वी पाकिस्तान की जगह एक नए बांग्लादेश का उदय हुआ था। फिर 1971 के युद्ध की तुलना 2016 के सर्जिकल स्टाइक से! कृपया राजदल पूरे देश की समझ को कम कर न आंकें। दूसरा यह कि कोई भी दल या राजनेता सेना के मनोबल को गिराने का पाप न करे। भारतीय सेना का गौरवशाली, यशस्वी इतिहास रहा है। सेना को राजनीति से दूर रखें। भारत और भारतीय कम अक्ल नहीं समझदार हैं, परिपक्व हैं।