सड़े सिस्टम से क्या उम्मीद मेरे दोस्त मांझी ?

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@ मुझे माफ करना दाना मांझी, चौला मांझी…कालाहांडी के डिप्टी कलेक्टर से लेकर कलेक्टर, एसपी..और फिर उड़ीसा के सीएम से लेकर चीफ सेकेट्ररी तक, सबको फोन किया, लेकिन ये सिस्टम सड़ चुका है @

हिन्दुस्थान के उड़ीसा राज्य के कालाहांडी जिले के भवानीपटना प्रखंड के एक गांव के मेरे आदिवासी दोस्त दाना मांझी, मुझे माफ करना। तुम्हारे और तुम्हारी 12 साल की बिटिया के साथ जो हुआ, उसके लिए कहीं ना कहीं हम भी गुनाहगार है।

मंगलवार, 23 अगस्त, 2016 के दिन तुम अपनी पत्नी को लेकर स्थानीय सरकारी अस्पताल में गए। और मंगलवार की रात ही तुम्हारी पत्नी की टीबी से मौत हो गई। तुम्हारे पास अस्पताल की एंबुलेंस के किराए के पैसे नहीं थे। कोशिशों के बाद भी तुम इतने पैसे नहीं जुटा पाए कि अपनी पत्नी के पॉर्थिव शरीर को ससम्मान घर ले जा पाते।….एक मजबूर पति जो कर सकता था, तुमने किया…दाना मांझी, तुमने उससे शादी के समय जो सात फेरे लिए थे ना, शायद उस अग्नि को साक्षी मानकर लिए सात वचनों को निभाया, और अपनी पत्नी के शव को कपड़े में लपेटकर पैदल ही वापस घर लौट चले…12 किलोमीटर का वो सफर कैसा होगा, ये सोचकर मेरे रोंगटें खड़े हो रहे हैं, और आंखों में आंसू है…मुझे चिंता नहीं कि मेरे ऑफिस में सब क्या सोच रहे हैं…मैं इन तस्वीरों को देख रहा हूं और व्यथित हूं।

लेकिन मैने अपने जर्नलिस्ट होने की ड्यूटी निभाने की पूरी कोशिश की है, और कर रहा हूं, और तब तक करता रहूंगा, जब तक तुम्हें इंसाफ नहीं मिल जाता और तुम्हारी पत्नी की मृत देह को वो सम्मान, जो हर मौत के बाद इंसान को मिलना चाहिए।

दाना मांझी, मैनें कालाहांडी की कलेक्टर ब्रूंधा डी के हर फोन को खटखटाया। कालाहांडी के एसपी ब्रजेश कुमार राय, अतरिक्त कलेक्टर चंद्रमनी बदनायक, प्रोजेक्ट डॉयरेक्टर विनीत कुमार और तुम्हारे एरिया एसडीएम सुकांता कुमार त्रिपाठी के फोन खटखटाए।

जब कोई नतीजा नहीं निकला, तो मैने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से संपर्क की कोशिश की। फिर उड़ीसा के चीफ सेकेट्ररी से, फिर सीएम ऑफिस से।
सब नकारे निकले। बस इतना पता चला है कि जिला कलेक्टर को कल सुबह एक रिपोर्ट देने को कहा है।

दाना मांझी, भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत और देश के कई प्रधानमंत्रियों को कवर करते करते सरकारी तंत्र में रिपोर्ट -रिपोर्ट खेलने का मतलब मैं जान गया हूं।

और कालाहांडी में करीब दो दशक पहले आए अकाल और उसके बाद की मौतों ने तो पहले ही पूरी दुनिया के सामने भारत का मुंह काला कर दिया था। लेकिन अफसोस कि हमारा सिस्टम उसके बाद भी नहीं सीखा।

दाना मांधी, मुझे माफ करना कि आजाद भारत के 70 साल बाद भी हम तुम्हें, तुम्हारी बेटी और तु्म्हारी पत्नी की मृत देह को वो सम्मान नहीं दे सके, जिसके तुम अधिकारी हो, एक भारतीय होने के नाते, एक इंसान होने के नाते।

तुम्हारा एक जर्नलिस्ट दोस्त।

युवा पत्रकार निमिष कुमार के फेसबुक वॉल से साभार

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