न्याय का माथा ऊंचा करने वाले जस्टिस को जानिए

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सीवान के सुपर-स्टार शहाबुद्दीन को जमानत देकर न्याय का माथा ऊंचा करने वाले जस्टिस जितेंद्र मोहन शर्मा भी बिहार के ही हैं। आइए, उनके बारे में कुछ बुनियादी जानकारियां हासिल करते हैं-

  • नाम- जितेंद्र मोहन शर्मा
  • जन्म तिथि- 2 जुलाई 1956
  • पटना हाई कोर्ट ज्वाइन करने की तारीख- 21 अप्रैल 2014
  • सेवानिवृत्ति की तिथि- 2 जुलाई 2018

शिक्षा-

गया जिले के सिंदौरी कोंच इलाके के राज कुमारी देवी हाई स्कूल से 1972 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। बीएससी और एलएलबी की डिग्रियां उन्होंने मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से हासिल कीं।

न्याय के क्षेत्र में-

  • लोगों को न्याय दिलाने के क्षेत्र में वे 1983 में आए, जब गया के सिविल कोर्ट में एक वकील के तौर पर प्रैक्टिस शुरू की।
  • 28 मई 1997 को वे डाल्टनगंज, पलामू में अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त हुए।
  • फिर उन्हें तरक्की देकर दरभंगा और आरा फैमिली कोर्ट का जज बनाया गया।
  • बाद में उन्होंने बक्सर, सारण और मुंगेर ज़िलों में ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश के तौर पर भी योगदान दिया।
  • उन्होंने गायघाट, पटना स्थित बिहार न्यायिक अकादमी के निदेशक के तौर पर भी अपनी सेवाएं दीं।

न्याय का माथा ऊंचा करने में जस्टिस जितेंद्र मोहन शर्मा के उल्लेखनीय योगदान की तरफ़ लोगों का ध्यान सीवान के सुपर-स्टार शहाबुद्दीन को बहु-चर्चित तेजाब कांड के गवाह की हत्या के मामले में ज़मानत दिये जाने के बाद गया है। हालांकि इसी मामले में फरवरी 2016 में उन्होंने शहाबुद्दीन की याचिका ख़ारिज कर दी थी। इसके बाद तेजाब कांड और गवाह की हत्या की जांच और सबूतों के मामले में क्या प्रगति हुई, वह तो नहीं मालूम, लेकिन अलग-अलग कारणों से सुपर-स्टार शहाबुद्दीन लगातार सुर्खियों में बने रहे।

सबसे पहले, बिहार सरकार में राष्ट्रीय जनता दल कोटे से मंत्री अब्दुल गफूर सीवान जेल में उनसे मिलने पहुंचे। कुछ ही दिनों बाद यानी अप्रैल की शुरुआत में बिहार की सरकार के बड़े साझीदार लालू प्रसाद यादव जी ने जेल में रहते हुए ही उन्हें अपनी पार्टी आरजेडी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सदस्य के तौर पर शामिल कर लिया। इसके बाद मई में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के मामले में शहाबुद्दीन के हाथ का आरोप भी उछला, लेकिन कानून का हाथ उनके शागिर्द माने जाने वाले लड्डन मियां तक जाकर ही रुक गया। फिर मई में सीवान जेल में दरबार लगाते पकड़े जाने के बाद रातों-रात उन्हें भागलपुर जेल में ट्रांसफर किया गया। ताज़ा-ताज़ा मामला यह है कि जस्टिस जितेंद्र मोहन शर्मा ने इसी 7 सितंबर को तेजाब कांड के गवाह की हत्या के मामले में उन्हें जमानत दे दी, जिसे हम न्याय का माथा ऊंचा करने में उल्लेखनीय योगदान बता रहे हैं और जिसके बाद शहाबुद्दीन ने संभवतः भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रिहाई काफिला निकाला, जिसमें सत्तारूढ़ गठबंधन के कई नेता भी शामिल हुए।

जस्टिस जितेंद्र मोहन शर्मा ने मोकामा के महाबली नेता अनंत सिंह को भी फरवरी 2016 में संजीत पहलवान हत्याकांड, मार्च 2016 में पुटूस हत्याकांड और अगस्त 2016 में जवाहर सिंह हत्याकांड में जमानत दे दी थी। यह अलग बात है कि क्राइम कंट्रोल एक्ट लगे होने की वजह से आदरणीय अनंत सिंह जी का रहना-सहना और खाना-पीना अभी जेल में ही होता रहेगा।